विकास के नाम पर किसानियत का मिटता वजूद ( दिल्ली मुंबई आर्थिक गलियारा DMIC)

 विकास किसे नही चाहिए ,और चाहिए तो कैसा चाहिए । एक बात या तो " घी घणा नही तो मुट्ठी चना " !!! विकास भी इसी तरह की राह पर है ।लच्छेदार बातों को अगर छोड़ दिया जाए तो एक दिन में ही साल भर का बढिया बनाया हुआ खाना परोस देना !! क्या जीवन का आधार हो सकता है ,ऐसे विकास के क्या मायने जो हमें हमारी धरोहरों से हमारी पैतृक सम्पत्तियों से दूर करदे और वो भी जबर्दस्ती । ऐसा ही इस विकास में घटित हो रहा है । सरकारों को लगता है कि अमुक जगह का अधिग्रहण करना है तो न तो किसी किसान से पूछा जाएगा न इस बाबत उस क्षेत्र के विशेषज्ञों से पूछा जाएगा ,जमीन की नाप तोल शुरू बैंकों में जबर्दस्ती पैसों का लेन देन । जब पैसा एकाउंट में पुहुचता है तब किसान को पता चलता है कि ये पैसा आपकी जमीन का है जिसके अब तुम मालिक नही रहे ,इसे अब ओढ़िये, बिछाइये , गले लटकाइये जी मर्जी कुछ भी कीजिये लेकिन जमीन पर बात मत कीजिये ,इसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश में किसानों के खातों में जबर्दस्ती पैसे डाले जा रहे हैं और किसान आपत्ति जता रहे हैं कि ये पैसा हमे नही चहिए !!

हमारी आपत्तियों को छोड़ भी दें तो हाल ही नवनिर्मित DMIC जो दिल्ली से मुम्बई को जोड़ेगा, इसके तथाकथित लाभ भी हैं जो आपकी नजर कर रहा हूँ :-

लाभ:

व्यापार और वाणिज्यिक गतिविधियों में वृद्धि: दिल्ली और मुंबई दोनों ही भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्र हैं और दोनों शहरों के बीच एक मजबूत आर्थिक गलियारा होने से व्यापार और वाणिज्यिक गतिविधियों में वृद्धि होती है। यह उद्यमियों, वित्तीय संस्थाओं और व्यापारियों के लिए अवसरों का एक बड़ा स्रोत बनता है।

रोजगार के अवसर: दिल्ली-मुंबई आर्थिक गलियारा आर्थिक विकास की गति को तेज करता है और दोनों शहरों में नौकरी के अवसर प्रदान करता है। यह उद्यमियों, विभिन्न क्षेत्रों में कर्मचारियों के लिए विकल्पों की वृद्धि करता है और रोजगार के साधनों को सुविधाजनक बनाने में मदद करता है।

वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता: दिल्ली और मुंबई में आर्थिक गलियारे के कारण वित्तीय सेवाएं, बैंकिंग सुविधाएं, बीमा और निवेश समाधान आसानी से उपलब्ध होती हैं। लोगों के लिए वित्तीय संरचना, ऋण और निवेश विकल्पों में सुविधा होती है, जो व्यक्तिगत और व्यापारिक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।

विकास के लिए आकर्षक स्थान: दिल्ली और मुंबई में आर्थिक गलियारा की मौजूदगी से विभिन्न क्षेत्रों में विकास की प्रेरणा मिलती है। आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि के कारण सामाजिक और आर्थिक इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आदि में निवेश बढ़ता है। ये मैं नही कह रहा हूँ ये उन विशेषज्ञों की रिपोर्ट है जो इस परियोजना की दिन रात पैरबी में लगे हैं ,एक बात और इसमे कहीं भी कोई बात किसान मजदूर के लिए नही आई है ,मसलन साफ है मिटना खेतिहर किसान को ही है । अब इसके नुकसान पर नजर डालिए 

नुकसान:

यत्रास्थल पर्यावरणीय प्रभाव:

 दिल्ली-मुंबई आर्थिक गलियारे के कारण यातायात और उद्योग गतिविधियों में वायु प्रदूषण और ध्वंस समस्याएं बढ़ती हैं। यह पर्यावरण के लिए एक नकारात्मक प्रभाव हो सकता है और स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।

शहरी बढ़ोतरी की चुनौतियां

दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में आर्थिक गलियारे एकत्रितीकरण की समस्या को बढ़ा सकते हैं। यहां बढ़ती आबादी, हाउसिंग क्रांति, परिवहन और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी आदि के कारण शहरों को सामरिक और प्रबल बनाने की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

असमंजस और अस्थिरता:

 दिल्ली-मुंबई आर्थिक गलियारे के कारण अस्थिरता की समस्या हो सकती है, जो आर्थिक नीतियों, वैश्विक मार्केट शर्तों और राजनीतिक परिवर्तनों के प्रभाव से उत्पन्न हो सकती है। यह निवेशकों, व्यापारियों और निवेश समुदाय को आंतरिक और बाहरी जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।

सामरिकता: 

दिल्ली-मुंबई आर्थिक गलियारे के बावजूद, कुछ क्षेत्रों में सामरिकता बढ़ सकती है। इसके कारण बड़ी कंपनियों और उद्योगों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, जो कम आंतरिक विकास और बाजार के लिए अवसरों को दिमागी रूप से दबा सकता है।

भाईचारे और समभाव पर चोट :- इस कॉरिडोर के साथ ही लगते मेवात के इलाके में बड़े बड़े बूचड़खाने खुल रहे हैं एक तरफ सरकार गौ बध के खिलाफ है दूसरी तरफ खाड़ी देशों के धनाढ्य शेखों को यहाँ कत्लखाने खोलने की इजाजत दे रही है ,गाय कटेगी हिन्दू मुस्लिम फसाद की जड़ बनेगी भाई चारा टूटेगा और तथाकथित राष्ट्रवादियों का मंसूबा कामयाब होगा ।

बंधुआ मजदूरों की नई कॉलोनी :- आज के किसान जब भूमिहीन होंगे तो आने वाली पीढ़ी जीविकोपार्जन के लिए कुछ तो करेगी फिर उनके पास बंधुआ मजदूर बनने के अलावा कोई चारा नही होगा 

कानून व्यवस्था की समस्या ::- बेरोजगारी हर समस्या की जड़ है ,इस परियोजना में सात नए शहर भविष्य में बसाए जाएंगे लेकिन ये 1540 किलोमीटर लंबी परियोजना जितने भी बड़े भूभाग से गुजरेगी उन भूस्वामियों के भविष्य में होने वाली तकलीफो को मिटाने के लिए इस परियोजना द्वारा दिये जाने रोजगार काफी नही होंगे , इस पर प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कानून व्यवस्था चरमरायेगी लड़ाई झगड़े आम बात होगी अपराध का एक नया युग पनपेगा । फेहरिस्त लंबी है कमियां फायदों से कई गुना ज्यादा है लिखना सम्भव भी नही ....

इस आंकलन से स्पष्ट होता है कि दिल्ली-मुंबई आर्थिक गलियारा से होने वाले लाभ और नुकसान एक संघर्षपूर्ण समस्या हैं। यहां निहित संभावित लाभों के साथ-साथ चुनौतियां भी हैं, जो सुविधाओं के साथ-साथ विकास को प्रभावित करती समस्याएं भी हैं। आवश्यक है कि समान्य लोगों और सरकारी संस्थाओं को इस आंकलन का उचित ध्यान देते हुए आर्थिक गलियारे के प्रबंधन और संगठन को विकासपूर्ण, न्यायसंगत और समर्पित बनाने की जरूरत है । जिन किसानों की जमीनों के अधिग्रहण इस परियोजना में हए है उनको भविष्य के लिए रोजगार की लिखित गारंटी दिए जाने की जरूरत है जिससे भविष्य का एक बढ़िया खाका तैयार हो सके किसानियत जीवित रह सके और किसानों की आने वाली पीढ़ियां अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सके ।


कृषि पर होता कुठाराघात

 भारत के बायो-टेक रेग्युलेटर ने जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) सरसों के बीज उत्पादन और परीक्षण के लिए पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है। यह इसके कमर्शियल इस्तेमाल से पहले का कदम है। हालांकि किसान जीएम सरसों (genetically modified mustard) की खेती शुरू कर सके आखिर जीएम सरसों क्या है ?.

जेनेटिक्स के प्रोफेसर और दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर दीपक पेंटल के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स में साल 2002 में डीएमएच-11 को विकसित किया था। इसे भारतीय सरसों की लोकप्रिय प्रजाति ‘वरुण’ की यूरोपीय सरसों के साथ क्रॉसिंग कराते हुए विकसित किया गया। इस प्रोजेक्ट की फंडिंग बायोटेक्नॉलजी विभाग और नैशनल डेयरी डिवेलपमेंट बोर्ड ने की थी। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की देखरेख में किए गए ट्रायल के मुताबिक वरुण के मुकाबले इसकी पैदावार 28 फीसदी ज्यादा का अनुमान लगाया गया है

कैसे तैयार हुई जीएम मस्टर्ड

पौधों की दो अलग-अलग किस्मों को मिलाकर संकर या हाइब्रिड वेरायटी बनाई जाती है। इसमें बीमारी के कम चांस होते हैं और उत्पादन ज्यादा रहता है। ऐसी क्रॉसिंग से मिलने वाली फर्स्ट जेनरेशन हाइब्रिड वेरायटी की उपज मूल किस्मों से ज्यादा होने का चांस रहता है। हालांकि सरसों के साथ ऐसा करना आसान नहीं था। इसकी वजह यह है कि इसके फूलों में नर और मादा, दोनों रीप्रोडक्टिव ऑर्गन होते हैं। यानी सरसों का पौधा काफी हद तक खुद ही पोलिनेशन कर लेता है। किसी दूसरे पौधे से परागण की जरूरत नहीं होती। ऐसे में कपास, मक्का या टमाटर की तरह सरसों की हाइब्रिड किस्म तैयार करने का चांस काफी कम हो जाता है। जीएम सरसों को लेकर

लोगों में विरोधाभास  हैं। एक खेमा इसका विरोध कर रहा है जबकि दूसरा खेमा इसके पक्ष में है। पर्यावरण से जुड़े संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। विरोध की पहली वजह जीएम मस्टर्ड में थर्ड ‘बार’ जीन की मौजूदगी है। कहा जा रहा है कि इस कारण जीएम मस्टर्ड के पौधों पर ग्लूफोसिनेट अमोनियम का असर नहीं होता। इससे केमिकल हर्बिसाइड्स का इस्तेमाल बढ़ेगा और मजदूरों के लिए काम के मौके घट जाएंगे। अगर इस हर्बिसाइड का अंधाधुंध उपयोग होने लगा तो पौधों की कई किस्मों को नुकसान हो सकता है। साथ ही उनका कहना है कि जीएम मस्टर्ड के कारण मधुमक्खियों पर बुरा असर पड़ेगा। मधुमक्खियों के शहद बनाने में सरसों के फूल बड़ा रोल निभाते हैं।

क्या हैं फायदे

इसका समर्थन करने वालों का तर्क है कि अभी देश में बीटी कॉटन ही एकमात्र ट्रांसजेनिक फसल है, जिसकी भारत में व्यावसायिक खेती की जा रही है। ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर माना जा सके कि इस प्रजाति की पिछले दो दशकों से हो रही खेती का जमीन पर या उस इलाके की संपूर्ण जैव विविधता पर किसी भी तरह का नकारात्मक असर पड़ा है। देश में विकसित ट्रांसजेनिक हाइब्रिड मस्टर्ड (डीएमएच-11) से ऑयल सीड की पैदावार बढ़ने की उम्मीद है। इसे अतिरिक्त पानी, खाद या कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों को कम खर्च में ही बेहतर फसल मिलने लगेगी। इससे देश में खाद्य तेलों के आयात पर होने वाला खर्च कम करने का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। पिछले वित्तीय वर्ष में भारत को करीब 19 अरब डॉलर का खाद्य तेल आयात करना पड़ा था। देश में अब तक जीएम सरसों के बीज उपलब्ध नहीं हैं। अभी केंद्र सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय की कमेटी की सिफारिश को स्वीकार भी नहीं किया है। मंजूरी मिलने के बाद ही किसानों के खेतों तक जीएम सरसों के पहुंचने का रास्ता खुलेगा। इस किस्म को चालू रबी सीजन से ही उगाया जाए, इसकी जोरदार पैरवी हो रही है। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन जीएम फसलों के प्रयोग से पहले भूमि परीक्षण अनिवार्य बनाने की सिफारिश कर चुके हैं।

इससे होने वाले नुकसान :-

देसी बीजों की तुलना में जीएम बीज से प्राप्त उपज कम स्वादिष्ट होती है।

जीएम बीज बहुत महंगे मिलते हैं।

अभी भारत में केवल रुई की (Cotton) जीएम सीड्स से खेती की जाती है। और कोई भी Gm बीज भारत में अभी उपलब्ध नहीं हैं।

हर बार इस्तेमाल करने के लिए नए जीएम बीज (gm seeds) खरीदने पड़ते हैं।

देशी बीजों की तुलना में जीएम बीजों को अधिक समय तक स्टोर करके नहीं रखा जा सकता है।

जीएम बीजों से प्राप्त उपज को खाने से शरीर में एलर्जी जैसे कुछ रोगों के होने का खतरा भी रहता है।

ऊपर लिखित बातों का उद्दरण करने का असल मकसद भविष्य की चिंता है हमारा इलाका जिस तरह ईश्वर प्रदत्त जलवायु पर निर्भर उसको लेकर हम खेती पर प्रयोग नही कर सकते GM सीड्स को लेकर तरह तरह के फायदे GEAC बता रही है लेकिन साथ स्वामीनाथन आयोग ने मिट्टी की जांच को अनिवार्य जैसी शर्त इसमे जोड़कर इससे ज्यादा होने वाली पैदावार की भी गारंटी से मुंह मोड़ने वाली बात ही है । मित्रों घर पर बैठिए कुछ मत कीजिये .....आराम में जो मजा है दुनियां की किसी भी मूवमेंट में नही लेकिन ध्यान रहे आपको आभाष तब होगा जब आपके हाथों से परम्परागत खेती और आपकी जमीन निकल जायेगी और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी । आप सभी बुद्धिजीवी वर्ग से अनुरोध है यूँ हाथ पर हाथ रखकर मत बैठिए ,उठिए अपनी किसानी को बचाइए जिससे आने वाली नश्ले कुछ दिन संघर्ष कर सकें