राष्ट्र ताऊ चौधरी देवीलाल जी एक जीवन परिचय


चौधरी देवीलाल 25 सितम्बर 1914 को तेजा खेड़ा गांव, जिला सिरसा राज्य हरियाणा, भारत में एक जाट हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे। चौधरी देवी लाल राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता सेनानी, हरियाणा राज्य के मुख्यमंत्री और भारत के उप प्रधानमंत्री रहे।
चौधरी देवी लाल ने
अपने स्कूल की दसवीं की पढ़ाई छोड़कर सन् 1929 से ही राजनीतिक गतिविधियों
में भाग लेना शुरू कर दिया था। चौ. देवीलाल ने सन् 1929 में लाहौर में हुए
कांग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशन में एक सच्चे स्वयं सेवक के रूप में भाग लिया
और फिर सन् 1930 में आर्य समाज ने नेता स्वामी केशवानन्द द्वारा बनाई गई
नमक की पुड़िया ख़रीदी, जिसके फलस्वरूप देशी नमक की पुड़िया ख़रीदने पर चौ.
देवीलाल को हाईस्कूल से निकाल दिया गया। इसी घटना से प्रभाविक होकर देवी
लाल जी स्वाधीनता संघर्ष में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे
मुड़कर नहीं देखा। देवी लाल जी ने देश और प्रदेश में चलाए गए सभी
जन-आन्दोलनों एवं स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसके लिए
इनको कई बार जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं।

चौधरी देवी लाल अक्सर कहा करते थे
कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुज़रता है, जब तक ग़रीब किसान,
मज़दूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा, तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने
नहीं हैं। इसलिए वो अक्सर यह दोहराया करते थे- हर खेत को पानी, हर हाथ को
काम, हर तन पे कपड़ा, हर सिर पे मकान, हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी।
चौधरी देवी लाल अक्सर कहा करते थे कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से
होकर गुजरता है, जब तक ग़रीब किसान, मजदूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा,
तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने नहीं हैं। इसलिए वो अक्सर यह दोहराया
करते थे- हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन पे कपड़ा, हर सिर पे मकान,
हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी। अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए चौ.
देवीलाल जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे। 

श्राद्ध पक्ष और उसका महत्त्व



पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है. यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की तिथि में सभी पित्रों के श्राद्ध किए जाते हैं. उसमें विज्ञान यह है कि इन दिनों चंद्रमा अन्य महीनों की अपेक्षा पृथ्वी के पास होता है. इसी कारण उसकी आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी और उसमें अधिष्ठित प्राणियों पर विशेष रूप से पड़ता है. तब जितने सुक्ष्म-शरीरयुक्त जीव चंद्रलोक के ऊपरी भाग में स्थित पितृलोक में जाने के लिए बहुत समय से चल रहे होते हैं या चल पड़े होते हैं, उनका उद्देश्य करके उनके संबंधियों के जरिए प्रदत्त पिंड अपने अन्तर्गत सोम के अंश से उन जीवों को आप्यायित करके उनमें विशिष्ठ शक्ति उत्त्पन्न करके उन्हें शीघ्र और अनायास ही यानि बिना अपनी मदद के ही पितृलोक में प्राप्त करा दिया करते हैं. तब वे पितृ भी उनकी ऐसी सहायता पाकर उन्हें हृदय से समृद्धि और वंशवृद्धि का आर्शीवाद देते हैं.

दिनांक------- तिथि 24 सितंबर- पूर्णमासी श्राद्ध 25 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध 26 सितंबर- द्वितीया श्राद्ध 27 सितंबर- तृतीया श्राद्ध 28 सितंबर- चतुर्थी श्राद्ध 29 सितंबर- पंचमी श्राद्ध 30 सितंबर- षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर- सप्तमी श्राद्ध 2 अक्टूबर- अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर- नवमी श्राद्ध 4 अक्टूबर- दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर- एकदशी श्राद्ध 6 अक्टूबर- द्वादशी श्राद्ध 7 अक्टूबर- त्रयोदशी श्राद्ध 8 अक्टूबर- चतुर्दशी/अमावस्या श्राद्ध 9 अक्टूबर- मातामह श्राद्ध
श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले जिसके लिए श्राद्ध करना है उसकी तिथि का ज्ञान होना जरूरी है. जिस तिथि को मृत्यु हुई हो उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए. लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति होती है कि हमें तिथि पता नहीं होती तो ऐसे में आश्विन अमावस्या का दिन श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ होता है क्योंकि इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है. दूसरी बात यह भी महत्वपूर्ण है कि श्राद्ध करवाया कहां पर जा रहा है. यदि संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए. यदि यह संभव न हो तो घर पर भी इसे किया जा सकता है. जिस दिन श्राद्ध हो उस दिन ब्राह्मणों को भोज करवाना चाहिए.भोजन के बाद दान दक्षिणा देकर भी उन्हें संतुष्ट करें.
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है. यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है. शास्त्रसम्मत मान्यता यही है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए. श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दिया ही जाता है साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सकें तो बहुत पुण्य मिलता है. इसके साथ-साथ गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु-पक्षियों के लिए भी भोजन का एक अंश जरूर डालना चाहिए.

राफेल !!! एक और बोफोर्स ।।

चुनावों से एक साल पूर्व हर बार की भांति देश का पारा धीरे धीरे बढ़ना शुरू । आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू । हाल ही सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच बयानों की तल्खी बढ़ी है ,विपक्षी दल ने हमले तेज कर दिए और अपने चुनावी समर में काम आने वाले नारे के रूप में कुछ शब्दों को अपने दल को फायदा पुहुचाने की गर्ज़ से गढ़ लिया है ।
गली गली में शोर है ,चौकीदार ही चोर है । इस पर भाजपा भी चुनावी समर के लिए अपनी कमर कस रही है ।
ताजा तरीन मामला राफेल लड़ाकू विमान को लेकर गरमाया हुआ है ,रक्षा के क्षेत्र में अपनी कोई उपलब्धि न होने के बाबजूद भी यह काम रिलायंस नेवल को मिला जबकि HAL जैसी सरकारी कम्पनी को इससे हाथ मलते हुए रख दिया गया । वर्तमान लड़ाईया में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने अपने बयान से और खलबली मचा दी । आखिर क्या है ये पूरा मामला इसे समझने की बिंदुबार कोशिश करते है ,

ऑफसेट का सीधा सा मतलब है कि राफेल, भारत की कम्पनी को एक तय हिस्से का काम देगा...ये क्लॉज़ UPA ने लगवाया था HAL के लिए..और इसी क्लॉज़ के सहारे मोदी ने अम्बानी को डाल दिया राफेल सौदे में..

● राफेल में 50% ऑफसेट क्लॉज़ था..यानी डील का 50% इन्वेस्टमेंट भारत मे होगा..ये इन्वेस्टमेंट है, मैन्युफैक्चरिंग नही..तो Make In India की बात आधी अधूरी सी है..

● ये 50% हिस्सा राफेल बनाने तक सीमित नही है..कोई भी डिफेंस का सामान इसमे शामिल किया जा सकता है..

● 50% का 74% भारत से एक्सपोर्ट होना चाहिए..ये बहुत कड़ी शर्त लगाई थी UPA ने..इससे भारत को बड़ी विदेशी मुद्रा मिल सकती थी..

● यानी ऑफसेट के मुताबिक टोटल डील का लगभग 37% भारत में ही बनेगा ये तय था..50% का 74% = 37% (ऊपर का पॉइंट वापस देखिए)

● एक्सपोर्ट का मतलब उसकी क्वालिटी और मूल्य इंटरनेशनल स्टैण्डर्ड के होने चाहिए..उसके बिना एक्सपोर्ट सम्भव नही..यानी HAL विश्वमान्य शस्त्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा था..

● ये काबिलियत भारत मे HAL, L&T, टाटा और महिंद्रा ग्रुप में ही है..पर कांग्रेस ने HAL को चुना था..क्योंकि इसमे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रावधान भी था जो मोदी सरकार ने Dilute किया..

● अगर किसी साल में उस साल के ऑफसेट का काम नही हो पाता तो राफेल को उस मूल्य का 5% जुर्माना भरना पड़ेगा..अब सोचिये राफेल इतना रिस्क अम्बानी पर क्यों लेगा जिसे हवाई जहाज की ABCD नही मालूम?

● पूरी डील लगभग 59 हजार करोड़ की है..असेम्बलिंग भी भारत मे बनना ही माना जायेगा..लगभग 22,000 करोड़ ₹ की विदेशी मुद्रा की कमाई..कितना बड़ा खेल है समझे?

● इसके अलावा ऑफसेट के अनुसार 6% टेक्नोलॉजी शेयरिंग का हिस्सा भी भारत का होना चाहिए..तो 59000 करोड़ का और 6%..यानी 3540 करोड़ ₹ का बोनस HAL को..सोचिये कांग्रेस की दूरदर्शिता..

● ये सरासर झूठ है कि ऑफसेट पार्टनर यानी अंबानी को चुनने में भारत की कोई भूमिका नही है..भारत ने Dassault से डील की फ्रेंच सरकार के माध्यम से..तो Dassault कैसे डील कर सकता है अम्बानी से बिना भारत सरकार के?

लगभग 3 बिलियन € का काम सरकारी कम्पनी को मिलता तो सरकार को भी डिविडेंड मिलता..सरकारी कम्पनी की वैल्यू बढ़ती सो अलग..विदेशी मुद्रा आय, टेक्नोलॉजी जैसे फायदे भी होते..ये किसी प्राइवेट कम्पनी को कोई सरकार क्यों देगी?

ऑफसेट क्लॉज़ लोगो को इससे सहज तरीके से समझाना सम्भव नही..आज के ऑफसेट के बारे में मोदी सरकार कुछ बोलने को तैयार नही है..पर कहानी बना रही है बीजेपी. !!! 
इन तथ्यों से भाजपा मुँह नही मोड़ सकती और न ही अपनी सफाई दे सकती । सरकार में रहकर सरकार या देश को चूना लगाना कैसे जायज है ये प्रश्न भी भाजपा के जी का जंजाल बना हुआ है ।
इतना जरूर है कि ये महज चुनावी स्टंट नही है इसमें बहुत लोगों के हाथ गहराई तक सने है ।जरूरत है इसकी जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए और उसकी निगरानी माननीय उच्चतम न्यायालय करे ,जिससे दूध का दूध और पानी का पानी किया जा सके ।।  इसी उम्मीद में कुछ इसमे नया आयाम लिखा जाए जल्दी न्याय का दरवाजा खुले और देश की जनता को सही जानकारी मिले ।।
आपका
निर्भय सिंह
बडेसरा 

समाज में बेटी बचाओ, बेटी पढाओ के नारे का कडवा सच


तहजीब और तमीज का मतलब क्या है ,ये कहा से आती है ? तालीम का मकसद क्या है ??तालीम या शिक्षा का मूल मकसद मनुष्य के परिपेक्ष में देखा जाये तो चरित्र की एक ईमारत खड़ी करना समझिये !! सामजिक परिवेश में इसे पारवारिक संस्कार से जोडकर देखते है !! यक्ष प्रश्न यह उठता है ? क्या शिक्षित इन्सान चारित्रिक रूप से उतना ही अच्छा होगा जितना किउसे होना चाहिए ??
लेकिन आज के इस पाश्चात प्रभाव वाले दौर में संस्कार दम तोड़ते नजर आ रहे है |ऐसा हुआ क्यों ? इसकी जड कहा है उन्हें तलाश करने की जहमत उठाए कोन !!
moderanisation and westeranisation are not identical concept !!!
हम आधुनिक हो और होने भी चाहिए ,लेकिन पश्चात् प्रभाव को लाद कर अपने मन में मग्न हम ये न सोचे कि समाज में कोई हमारा भी इसी प्रकार का अनुसरण करे !!
द्वतीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में करीब चार से पांच लाख लोग मारे गए थे उनमे ज्यादातर अनेक देशो सैनिको के साथ साथ सामान्य नागरिक भी शामिल थे | जीवित इंसानों में ज्यादा संख्या महिला वर्ग की थी | युद्ध के उपरांत पैदा हुए तत्कालीन हालातो पर सरकारों काम करना शुरू किया , और गाड़ी धीरे धीरे पटरी पर आने लगी | और यूरोप में आर्थिक सम्रद्धि स्थापित होने लगी , आर्थिक सम्रद्धि के अलावा भी बहुत कुछ करना जरुरी था जिससे सामजिक बिषमताए मिटाई जा सके !!!
सामाजिक विषमताए क्या थी ? पहली सबसे बड़ी समस्या थी पुरुष और महिलाओ की संख्या का असमान होना !!! संख्या में महिला ज्यादा थी और पुरुष कम !! इस असमानता ने वहां के सामाजिक ताने बाने को हिला कर रख दिया !! जिन महिलाओ के पति या होने वाले साथी युद्ध में मारे गयें वो जाये तो जाये कहा ?
इस बात को यूरोपियन देशो की सरकारे ज्यादा दिनों तक नजरंदाज नही कर सकी और युद्ध प्रभाबित देशो ने अपने कानूनों में इस तरह की शिथिलता की कि कोई भी महिला अपने मनोरंजन के लिए किसी पुरुष मित्र से सार्वजानिक स्थानों पर मिल सकती है या सीधे शब्दों में कहे तो अपनी शारीरिक भूख शांत कर सकती है !!!
इस तरह इन क्रिया कलापों को होते वहा की युवा पीडी ने देखा और यह एक रिवाज में बदल गया !!
देश स्वतंत्र होने पर हमारे देश के धनाड्य वर्ग का यूरोपियन देशो में आना जाना शुरू हुआ और वहा से कुछ सीखा या न सीखा पर ये बेहूदापन जरुर सीखा !!! कम कपड़े पहनना, सार्वजनिक स्थानों पर आलिंगन करना, बगैरह बगैरह | बाकी का काम हमारे फिल्म उद्योग ने कर दिया और आज के दौर में मोबाइल ने इसमें अपने चार चाँद लगा दिए !!
इसका असर समाज पर इतना पडा कि कोई अंदाजा नही लगा सकता ,कुछ चरित्र से गिरे लोग कब अपने घर की बहु के दीवाने हो जाते हैं पता नही चलता ?? पता तब चलता है जब बेटा असलियत को भांप कर बाप का सर फोड़ देता है !!! ऐसे चरित्र से गिरे इंसान की नजर कब किस बहु बेटी पर पड जाये और कब उसे अपनी हबस का शिकार बना ले कोई नही जनता !! सरकार बेटी बचाओ बेटी पढाओ का नारा दे रही है पर इन बह्शियो से कोई बेटी सुरक्षित नही !! जरुरत है आप अपने बच्चो को समय दो उन्हें उंच नीच वाली हरकतों का ज्ञान कराओ और अपने बच्चे को भरोसा दिलाओ कि हम आपके साथ है तब जाकर हमारे बच्चे इन तथाकथित पढ़े लिखे बह्शियो से सलामत रहेंगे !!!
उम्मीद है आप सब अपने बच्चो के साथ साथी बनकर उनका ख्याल रखेंगे !!
आप से इसी उम्मीद के साथ
आपका
निर्भय सिंह
बडेसरा

भारत की विदेश निति और उसके विफल आयाम

पिछले दो तीन दिन में एक साथ ही पाकिस्तान के अलग अलग तरह के घटनाक्रम हुये है ।
पहला हमारे सैनिक के साथ पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम द्वारा की गई बर्बरता ।।
दूसरा जिनको सिर्फ अपनी मस्ती से मतलब ऐसे लोगो के लिए क्रिकेट के मैदान में पाकिस्तान पर भारत की बड़ी जीत ।।
तीसरा पाकिस्तान के कठपुतली प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा हमारे देश के तथाकथित 56" सीन वाले मजबूत प्रधानमंत्री को भेजा गया विदेश मंत्री स्तरीय बातचीत का न्योता ।।
इन सब बातों से क्या सीख मिली , न पाकिस्तान की बर्बरता बन्द हुई न हम इतने संजीदा हुए कि अपनी सेना के जवान की सहादत के लिए कुछ प्रयत्न करते और ऊपर से हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार बातचीत के लिए राजी ?? सवाल यह उठता है आखिर सरकार चला कोन रहा है ? विदेशनीति के नए परिभाषित आयाम कोन लिख रहा है । हम इतने लचर हो कैसे गए , सेना के हाथ अगर खुले है तो ऐसी कोनसी मजबूरी हो गई कि समाचार पत्रों की सुर्खियों में सेना की मजबूरी सी दिखाई पड़ती है । हमारे जवान 5 किलो की भारी भरकम नकारा INSAS को उठाने को मजबूर क्यों है , हम अभी तक उच्च कोटि हथियार अपने सैनिकों को उपलब्ध क्यों नही करा पाए ।इन प्रश्नों का उत्तर कोई नही दे रहा , लोग क्रिकेट मैच की जीत की ख़ुशी में किसी देशभक्त शहीद के परिवार का रुदन दब जाता है और ऊपर से सरकार पाकिस्तान से बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर शहीदों के जख्मो पर नमक छिड़कने का काम करती है ।मन व्यथित है पुकार रहा है " हे कृष्ण फिर से आओ और अपने सुदर्शन चक्र का प्रताप हमे दिखलाओ ।
इसी उम्मीद में हम सब !!!

भारत की अमेरिकी चक्रव्यूह में कूटनीतिक विफलता

आप सुबह सुबह अच्छी खबर पढ़ने को या सुनने को बेचैन रहते होंगे पर कभी कभी ऐसा भी होता होगा कि आपको अपनी अपेक्षा से कम या ज्यादा बुरी या अच्छी खबर मिले । बात राष्ट्रीय हित की हो तो और भी पेचीदगी भरी होती है ।
काम की बात जल्दी शुरू करते है ।।
 दिल थाम कर पढ़िए–मोदी सरकार ने देश की सम्प्रुभता को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने का पाप कर दिया है।  लेकिन यह विश्लेषण आपको किसी भी अखबार में पढ़ने या टीवी चैनलो पर सुनने को नही मिलेगा।
पिछले दिनों दिल्ली मे भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू की बैठक सम्पन्न हुई है इस बैठक में भारत की तरफ से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भाग लिया अमेरिका के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री भी इस बैठक में भाग लेने के लिए भारत आए थे।
इस बैठक में भारत का जोर मुख्यतः दो बातों पर था पहला ये कि अमेरिकी नाराजगी को देखते हुए भारत ईरान से तेल नहीं खरीदें तो कहां जाए? दूसरा ये कि अमेरिकी आपत्तियों के चलते रूस से मिसाइल क्यों न खरीदें?
भारत अपनी जरुरतों का एक चौथाई तेल ईरान से मंगाता है अभी जो तेल के दाम बढ़ रहे हैं यह दाम ओपेक देश बढ़ा रहे हैं, अमेरिका के दबाव में आकर भारत ईरान से तेल मंगाना लगभग बन्द कर चुका है इसलिए उसे ओपेक देशो की मनमानी सहन करना पड़ रही है और इस कारण पेट्रोल डीजल के दाम भी बढ़ रहे है अमेरिकी दबाव में चाबहार पोर्ट पर भी भारत पीछे हट रहा है।
रूस से किया गया एस 400 मिसाइल प्रणाली का सौदा ‘आखिरी चरण’ में है लेकिन अमेरिका इस सौदे को न करने का दबाव बना रहा है।
लेकिन अमेरिका ने इन दोनों मुद्दों को पूरी तरह से इग्नोर कर दिया अमेरिकी प्रतिनिधि माइक पोम्पियो ने कहा कि भारत और अमेरिका पहली ‘टू प्लस टू’ वार्ता के दौरान बड़े और रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा होगी उन्होंने कहा कि बैठक मुख्य रूप से रूस से मिसाइल रक्षा प्रणाली और ईरान से तेल खरीदने की भारत की योजना पर केन्द्रित नहीं है।
तो फिर चर्चा किस बात पर की गयी ? और बैठक का नतीजा क्या निकला! यह भी समझ लीजिए-
भारत ने अमेरिकी दबाव में आकर इस बैठक में ‘कम्युनिकेशन कंपेटिबिलिटी ऐंड सिक्युरिटी अग्रीमेंट’ (कॉमकासा) पर हस्ताक्षर कर दिए है ओर मोदी सरकार की मांगों पर उसे ठेंगा दिखा दिया गया है।
अब यह कॉमकसा समझौता क्या है यह जानना बेहद जरूरी है क्योंकि यह भारत की सम्प्रुभता को गिरवी रखने वाले समझौतों की दूसरी कड़ी है। किसी देश पर अपना सम्पूर्ण प्रभाव जमाने के लिए अमेरिका तीन रक्षा समझौतों को आवश्यक मानता है इसी में से एक समझौता है कॉमकासा (COMCASA) जो इस बैठक में किया गयाष
दो अन्य समझौते हैंः लेमोआ यानी लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट (Logistics Exchange Memorandum of Agreement :LEMOA) और ‘बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट फॉर जियोस्पपेटियल को-ऑपरेशन यानी ‘बेका’ (Basic Exchange and Cooperation Agreement for Geo-spatial Cooperation: BECA)
लेमोआ पर मोदी सरकार अमेरिका से अगस्त 2016 में समझौता कर चुकी है जिसके तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल कर सकती हैं तीसरा समझौता ‘बेका’ पर भी वार्ता की शुरुआत हो चुकी हैं
लेमाओ समझौते के तहत अमरीका जब चाहे तब हिंदुस्तान के अंदर अपनी फौजों को तैनात कर सकता है। भारत के परिपेक्ष्य में यह बहुत गलत समझोता था अमरीकी सशस्त्र बलों को भारतीय नौसैनिक बंदरगाहों तथा हवाई अड्डो का अपने युद्घ-पोतों, जंगी जहाजों की सर्विसिंग, तेल भराई तथा उनके रख-रखाव के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत देने का मतलब है हमारे देश द्वारा अब तक अपनाए जा रहे स्वतंत्र रुख से और किसी सैन्य गठजोड़ में शामिल न होने की उसकी नीति से पूरी तरह से हट जाना।
लेकिन कॉमकसा का समझौता तो ओर अधिक खतरनाक है इसे पहले सिसमोआ (CISMOA) के नाम से जाना जाता था इस पर दस्तखत करने के बाद अमेरिका अपनी कम्पनियों द्वारा सप्लाई किए गए हथियारों का समय समय पर निरीक्षण करने का हकदार होगा। यानी वह जब चाहे मांग कर सकता है कि जिन हथियारों पर अमेरिकी संचार उपकरण लगे हैं वह उनकी जांच करेगा यह समझौता दोनों देशों के सैन्य बलों के संचार नैटवर्कों का आपस में जोड़ देगा भारत की कोई तकनीक सीक्रेट नही रह जाएगी।
यूपीए सरकार पर भी इन दोनों समझौतों को मानने का दबाव बनाया गया था लेकिन मनमोहन सरकार ने इस पर दस्तखत नहीं किए थे, तत्कालीन रक्षा मंत्री, ए के अंथनी ने इस संबंध में स्पष्ट रुख अपनाया था।
इसे मोदी समर्थक भारत की कूटनीति कहेंगे लेकिन LEMOA ओर COMCASA पर हस्ताक्षर भारत की कूटनीतिक विफलता है क्योंकि किसी शक्तिशाली देश जैसे अमरीका की गोद में बैठ जाने को कूटनीति नहीं कहते, कूटनीति का अर्थ होता है सभी देशों के साथ अच्छे सम्बंध बना के हर देश का अपने सामरिक हितों के पक्ष में इस्तेमाल करना। LEMOA ओर COMCASA जैसे किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर के अमरीका जैसे किसी शक्तिशाली देश की सेना को अपनी सरज़मी पर बुलाने को आत्मसर्पण करना बोलते हैं, कूटनीति नही।
स्पष्ट है कि भारतीय हितो से समझौता कर मोदी सरकार अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों की गोदी में खेलने को तैयार किस दबाब में हुई ये जानने की न तो कोई कोशिश कर रहा है, न किसी ने जरूरत समझी ।हमने अपने परम्परागत साथी रूस को दरकिनार करते हुए साम्रज्य वादी अमेरिका को गले क्यों लगाया इसका कोई दीर्घकालिक कारण नजर नही आता ।
भगवान हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार को सद्बुद्धि दे ।।