केंद्र सरकार के चार साल पुरे होने पर सरकार के चाहने वाले और विरोधी मीडिया द्वारा किये गए एक सर्वे पर अपनी अपनी बात रख रहे है |, सर्वे में बताया गया है कि आने वाले 2019 के चुनावो में प्रधानमन्त्री मोदी जी जोड़ तोड़ करके सरकार बनायेंगे | 2014 के चुनावो के समय भाजपा को 45 प्रतिशत लोगो ने मत दिया अब यह आंकड़ा घट कर 37 प्रतिशत हो गया है !!! मतलब बहुमत से सिर्फ 2 सीटें ज्यादा ? अब सर्वे वाली एजेंसी पर ऐसा कोनसा थर्मामीटर है जो अभी से नाप दिया कि 2 सीट ही ज्यादा मिलेंगी !! सर्वे एजेंसी किसी के कहने पर ही जनता का मूड जानने की कोशिश करती है , इनकी विश्वसनीयता भी सवालो के घेरे में रहती है !इनकी भविष्यवाणी कभी सच नही हुयी | सर्वे कराने की जरुरत क्यूँ पड़ी , इसका जवाब गिने चुने कार्पोरेट घरानों के पास ही हो सकता है |उनके अपनी पसंदीदा सरकारों से हित जुड़े होते है ? अदानी ,अम्बानी ,रामदेव जो कि पिछली सरकारों में अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहे थे ,इस सरकार में सहज महसूस कर रहे है | अदानी के पॉवर प्रोजेक्ट को सरकार ने लोन उपलब्ध कराया और इसी सरकार के समय उनका मुनाफा कई गुना बढ गया , यही हाल कमोवेश पतंजली वाले बाबा रामदेव का है पिछली सरकार के समय उनको हर महीने किसी न किसी तरह की जाँच से उनके उत्पादों को गुजरना पड़ रहा था !!! अब जाकर उन्होंने राहत की सांस् ली है ? अम्बानी भी अपना जिओ प्रोजेक्ट इसी सरकार के समय लांच कर चुके है और अरबो रूपए का मुनाफा कमा चुके है !!कर्पोरेट घराने पिछले दरवाजे से सरकार की नीतिया तय करते है | सरकार में रहने वाली पार्टिया इसके बदले अपने खर्चे के लिए चंदे के रूप में कार्पोरेट घरानों से मोटी रकम बसूल करती है | अब सरकारों को खुद अपने कामो का लेखा जोखा भी प्राइवेट कम्पनियों से करवाना पड़ता है | सरकार में रहने वाली पार्टिया किसी नीति विशेष के तहत शासन नही करती ,उनकी नीतिया काल खंड के हिसाब से बदल जाती है | पार्टियों का अपनी नीतियों के लेकर कोई ऐसा मानक नही होता कि उस पर सतत वो एक जैसा रुख अख्तियार कर सके !! भाजपा और कांग्रेस की नीतियाँ कमोवेश एक जैसी है !! कोई खास अंतर नही है |सरकार बनाने से लेकर सरकार चलाने तक एक जैसा ही तरीका है | कांग्रेस पर एक परिवार विशेष का प्रभाव रहता है , और दूसरी तरफ भाजपा पर संघ की नीतियों को लागु करने का !! अब प्रश्न एक खड़ा होता है कि भाजपा पिछले चार साल से सरकार में है , चुनावो पूर्व किये गए वायदों की फेहरिस्त उनकी बहुत लम्बी है | राममन्दिर, धारा 370, समान नागरिक आचार संहिता , 15 लाख का हर किसी के खाते वाली बात तो पार्टी सरेआम जुमला मान चुकी है , गरीबी उन्मूलन , रोजगार , किसानो की आय दोगुनी करने जैसे उनके मुलभुत वायदों का क्या हुआ ?? सरकार नोट बंदी और पाकिस्तान के विरुद्ध की गयी सर्जिकल स्ट्राइक पर अपनी पीठ थपथपाना नही भूलती !! इन दोनों मसलो पर सरकार को कोई कुटनीतिक समस्या का सामना करना नही पड़ा !! न तो संयुक्त राष्ट्र संघ में इसके लिए कोई पैरवी करनी पड़ी न ही अंतराष्टीय जगत की नाराजगी झेलनी पड़ी ?? नोट बंदी अभी तक अपनी असफलता की वजह से आज भी लोगो के जहन से उतरी नही है !! सेना की बात की जाये तो सेना समय समय पर इस तरह की कार्यवाही को अंजाम देती रहती है | वो बात अलग है कि सरकार ने इसे अपने पक्ष में इस तरह भुनाया जैसे प्रधानमन्त्री रण की लड़ाई जीत कर आये हो ? 2014 से पहले सेना ने चूड़ियाँ नही पहनी थी ,सेना ने तो अब तक जितनी लड़ाई लड़ी थी वो इस सरकार के कार्यकाल से पहले ही लड़ चुकी थी !!! सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए बहुत झूटे आंकड़ो का सहारा ले रही है , वास्तविकता से कोई लेना देना नही है | सरकार अभी तक देखा जाये तो हर मोर्चे पर बिफल रही है !! अटल आडवानी जी के जमाने की राजधर्म की नीति को दरकिनार करके तथाकथित कूटनीति को अपना लिया है !!भाजपा को मशीन बना दिया है ,जैसा बहुमत 2014 में मिला ऐसा फिर मिलेगा लगता नही ....चाहे कोई सर्वे करा लो या कोई और जुमला तैयार कर लो !!!
मनुष्य एक सामजिक प्राणी है और जीवन जीने की कला उसे बखूबी आती है | अपनी सहूलियत के हिसाब से मनुष्य अपने आप में कई तरह से परिवर्तन स्वयं कर लेता है ! हाल ही के दिनों में देश में राजनैतिक उठा पटक देखने को मिली , राष्ट्रिय स्तर के दोनों दलों ने अपना अपना वजूद कायम रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया |आप भी अंदाजा लगा रहे होंगे कि बात कहा की चल रही है , जी हा आपका कयास बिलकुल निशाने पर है !!! किस्सा कर्नाटक का है , भाजपा को अति महत्वाकांक्षा ले डूबी | भाजपा के सिपहसलार रेड्डी बंधुओ की तिकडम काम नही आई !! येदुरप्पा से भी जिस तरह के करिश्मे की उम्मीद थी ऐसा वो कर नही पाए ,बाकि लोग जैसे अनंत कुमार ,करन्द्ज्लाने आदि कोई खास उपयोगी हुआ नही !! उधर कांग्रेस के पास राज्य खोने के अलावा कोई चारा नही था !!सिद्धारमैया अपने लिंगायत वाले फार्मूले में खुद ही फस गए थे ,उनके भाजपा समकक्षो ने लिंगायतो को टिकट देकर उनको तक़रीबन फेल कर दिया था !!! लेकिन इसके बाद भी उनका प्रदर्शन ऐसा नही था कि पार्टी उन्हें डाट फटकार लगाये या उनके काम को लेकर नाखुशी जाहिर करे !! इसका एक सीधा सा कारण यही था कि भाजपा की देशव्यापी लहर और व्रहत प्रचार तंत्र के होने के बाद भी वो भाजपा को सत्ता की दहलीज पर जाने से रोकने में कुछ हद तक सफल रहे है !!
सत्ता में आंकड़ो का बड़ा महत्व होता है 78 सीटे जीत कर वो अपने वजूद को कुछ हद तक दोड़ में शामिल रहने में कामयाब रहे ,अगर इतनी सीटें कांग्रेस नही जीतती तो भाजपा निश्चित सरकार बना देती ,कुमारस्वामी प्लान धरा का धरा रह जाता ,हालंकि सिद्धारमैया अपने आपको अंतिम दिन तक कांग्रेस को सत्ता के करीब देख रहे थे ,चुनाव परिणाम जैसे ही आना शुरू हुआ राजनैतिक दलों में हलचल मचना लाजिमी था ,लेकिन "दूध का जला छाछ को फूंक फूंक कर पिता है " इस पर कांग्रेस ने अपने दो धुरंधरों ,अशोक गहलोत और गुलाम नबी आजाद को तुरंत बंगलुरु भेज दिया ,और उन्होंने तमाम तरह की अटकलों को ठेंगा दिखाते हुए कांग्रेस समर्थित सरकार बनाने में अपना पूरा पूरा योगदान दिया !!! इस सबके बीच भाजपा में कुछ विरोधी स्वर भी उठे ,हाशिये पर जा चुके यशवंत सिन्हा, धवन , और भी गुपचुप तरीके से अपनी पार्टी के कर्नाटक में अपनाये जा रहे तरीके से नाखुश दिखे ...मामला सुप्रीम कौर्ट गया और भाजपा जो जोड़ तोड़ पर आमादा थी अपने आप को पंगु समझने लगी !!! और फिर एक अप्रत्यासित चमत्कार की आस में सदन में बहुमत साबित करने पर अडी रही और अंत में हार का अंदेशा होने पर येदुरप्पा ने अपना स्तीफा दे दिया ,अमित शाह ,नरेन्द्र मोदी और नौ साल तक नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल के समय मंत्रिमंडल में रहने बजुभई वाला भी चाह कर भी कुछ नही कर सके | इतनी हार का अंदेशा किसी को भी नही था ,लेकिन हुयी , अब आगे तीन बड़े राज्यों में चुनाव आने वाले है ,कर्नाटक के नाटक के बाद बिपक्ष अपनी अपनी अलग अलग ही सही लेकिन एक साथ चुनाव रूपी एपिसोड में भूमिका निभाएगा जरुर ,ऐसे में भाजपा का चिंतित होना निश्चित है कांग्रेस के पास खोने को कुछ भी नही लेकिन भाजपा को होने वाले नुक्सान का आंकलन वो कर चुकी है ,ऐसे में अमित शाह और प्रधान मंत्री दोनों हो मिलकर इस परेशानी से पार नही पा सकते , उनके द्वारा दरकिनार किये गए अपने पुराने दिग्गजों को भी साथ में लेना पड़ेगा और तभी चुनाव रूपी समर में वो कुछ कर सकने की स्थिति में होगी वरना तीनो राज्यों में ज्यादा नही तो हालात कर्नाटक जैसे होंगे ,भाजपा सत्ता तक पुहुच कर भी नही पुहुचेगी !!!
सत्ता में आंकड़ो का बड़ा महत्व होता है 78 सीटे जीत कर वो अपने वजूद को कुछ हद तक दोड़ में शामिल रहने में कामयाब रहे ,अगर इतनी सीटें कांग्रेस नही जीतती तो भाजपा निश्चित सरकार बना देती ,कुमारस्वामी प्लान धरा का धरा रह जाता ,हालंकि सिद्धारमैया अपने आपको अंतिम दिन तक कांग्रेस को सत्ता के करीब देख रहे थे ,चुनाव परिणाम जैसे ही आना शुरू हुआ राजनैतिक दलों में हलचल मचना लाजिमी था ,लेकिन "दूध का जला छाछ को फूंक फूंक कर पिता है " इस पर कांग्रेस ने अपने दो धुरंधरों ,अशोक गहलोत और गुलाम नबी आजाद को तुरंत बंगलुरु भेज दिया ,और उन्होंने तमाम तरह की अटकलों को ठेंगा दिखाते हुए कांग्रेस समर्थित सरकार बनाने में अपना पूरा पूरा योगदान दिया !!! इस सबके बीच भाजपा में कुछ विरोधी स्वर भी उठे ,हाशिये पर जा चुके यशवंत सिन्हा, धवन , और भी गुपचुप तरीके से अपनी पार्टी के कर्नाटक में अपनाये जा रहे तरीके से नाखुश दिखे ...मामला सुप्रीम कौर्ट गया और भाजपा जो जोड़ तोड़ पर आमादा थी अपने आप को पंगु समझने लगी !!! और फिर एक अप्रत्यासित चमत्कार की आस में सदन में बहुमत साबित करने पर अडी रही और अंत में हार का अंदेशा होने पर येदुरप्पा ने अपना स्तीफा दे दिया ,अमित शाह ,नरेन्द्र मोदी और नौ साल तक नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल के समय मंत्रिमंडल में रहने बजुभई वाला भी चाह कर भी कुछ नही कर सके | इतनी हार का अंदेशा किसी को भी नही था ,लेकिन हुयी , अब आगे तीन बड़े राज्यों में चुनाव आने वाले है ,कर्नाटक के नाटक के बाद बिपक्ष अपनी अपनी अलग अलग ही सही लेकिन एक साथ चुनाव रूपी एपिसोड में भूमिका निभाएगा जरुर ,ऐसे में भाजपा का चिंतित होना निश्चित है कांग्रेस के पास खोने को कुछ भी नही लेकिन भाजपा को होने वाले नुक्सान का आंकलन वो कर चुकी है ,ऐसे में अमित शाह और प्रधान मंत्री दोनों हो मिलकर इस परेशानी से पार नही पा सकते , उनके द्वारा दरकिनार किये गए अपने पुराने दिग्गजों को भी साथ में लेना पड़ेगा और तभी चुनाव रूपी समर में वो कुछ कर सकने की स्थिति में होगी वरना तीनो राज्यों में ज्यादा नही तो हालात कर्नाटक जैसे होंगे ,भाजपा सत्ता तक पुहुच कर भी नही पुहुचेगी !!!
आज के प्रतिस्पर्धा के दौर में इंसान अपने हित के हिसाब से कार्य करता है !! ये क्रिया कलाप सब तरह के होते है ,वो राजनैतिक और सामाजिक आर्थिक सब तरह से अपने अपने स्वार्थ तलाश करता रहता है !! सामाजिक और राजनैतिक दायरा थोडा बड़ा होता है बनस्पति आर्थिक दायरे के ...आर्थिक दायरा अपनत्व से जुडा होता है पर उसका आधार या सामाजिक होगा या फिर राजनैतिक .इंसान अपने जीवन की पूर्ति के लिए धनार्जन करता रहता है अब उन्हें रास्ता किसी भी तरह का अख्तियार करना पड़े इस बात से खास लगाव नही होता !!! कुछ लोग सामाजिक स्तर पर इतने मजबूत होते है, कि वो कुछ भी करे लोग उनके किये को गलत मानते ही नही ! समाज के अपने मानदंड है हर इंसान उसमे खरा उतरे ऐसा कतई नही | फिर भी दावे कान कही न कही वो बुराई के पात्र बनते जरुर है . ऐसा ही कमोवेश राजनैतिक जीवन में भी होता है , लेकिन समय के हिसाब लोगो ने इसे अपने अनुरूप बनाने की असफल कोशिश करते रहते है !!! जहा जैसी बारिश बैसी छतरी ... राजनैतिक नियुक्ति इसी आधार पर होती है लोग उन्हें ही अपना प्रतिनिधित्व सोंपते है जो कालान्तर में उन्हें आर्थिक या सामजिक तौर पर फायदेमंद हो !!! हमारे देश में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली आधारित संघीय सरकार है !! राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमन्त्री शासनाध्यक्ष होता है राष्ट्रपति जी के नाम पर शासन चलता है .असल में रबर की मुहर ही समझा जाता है ...कुछ राष्ट्रपतियों को छोड़ दिया जाये तो सब आज तक रबर की मुहर ही साबित हुये है ,अपने राजनैतिक दल के प्रति ही वो ज्यादा जवाब देह रहे है !! केंद्र स्तर पर जो भूमिका राष्ट्रपति की है राज्य में वही काम राज्यपाल का है ..लेकिन वो संघीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में ही ज्यादातर अपनी भूमिका निभाता है ....लेकिन अभी के दौर में राज्यपालों की भूमिका संदेह पूर्ण नजर आती है संबिधान के अनुच्छेद 163– राज्यपाल की शक्तियां, राज्यपाल में दो प्रकार की शक्तिया निहित होती है| 1- मुख्यमंत्री(मंरिपरिषद) के सलाह से प्रयोग करने वाली. 2- स्वविवेक के आधार पर प्रयोग की जाने वाली शक्तियां !!! ये जो दूसरी वाली शक्ति स्वविवेक वाली बहुत ज्यादा प्रयोग के तौर पर लाई गयी है और इसका दूरगामी दुस्प्रभाव देखने को मिला है !!! राज्यों में होने वाले चुनावो में राजभवन संघीय सरकारों के पार्टी द्फ्तर में तब्दील हो जाते है !!! संघीय सरकार किसी भी तरीके से अपने को फायदे पुहुचाने वाले जतन करने से नही चूकती !! इसका सबसे बड़ा कारण संघीय सरकारों द्वारा अपनी पार्टी विशेष के लिए पैसे का इन्त्जाम इन राज्यो से ही होता है और यही कारण है सरकारे अनेतिक काम करने से नही चूकती !!!
सभी धर्मों में अपने आराध्य की पूजा उपासना, व्रत उपवास के लिये कुछ विशेष त्यौहार मनाये जाते हैं। ताकि रोजमर्रा के कामों को करते हुए, घर-गृहस्थी में लीन रहते हुए बंदे को याद रहे कि यह जिंदगी उस खुदा की नेमत है, जिसे तू रोजी-रोटी के चक्कर में भुला बैठा है, चल कुछ समय उसकी इबादत के लिये निकाल ले ताकि खुदा का रहम ओ करम तुझ पर बना रहे | बात रहमो करम की आयी है तो उस पर नजर करने की जरुरत है ? जो अपने परवरदिगार की पूजा करेगा उसे जन्नत मिलेगी इसमें कोई शक नही है ..लेकिन हाल ही अपनी सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में प्रस्तावित इकतरफा युद्ध विराम से पाक महीने रमजान का कितना सम्बन्ध है ये सरकार में बैठे ज्यादा जानकारो की सोच पर आधारित है !! पर एक बात सरकार ने स्वीकार करली है कि आतंकवाद एक व्यापर सा हो गया है इसमें भी समय रहते उतार चढाव् हो सकता है | केंद्र सरकार अपने आपको राष्ट्रवाद की पैरोकार मानती है पर ये राष्ट्रवाद महबूबा मुफ़्ती के सामने घुटने टेक देता है ये समझ से परे है | कुछ दिन पहले महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर की बिधान सभा में प्रधान मंत्री की तारीफों के पुल बांधती है और उन्ही की अनुशंषा पर केंद्र सरकार एक तरफ़ा संघर्ष विराम की घोषणा कर देती है !!! इस बात के क्या मायने निकाले जाए, क्या आतंकवादी नवरात्र के दिनों में संघर्ष विराम करेंगे ? या फिर तथाकथित सरकार भी सेना को सिर्फ और सिर्फ उपभोग की ही वस्तु समझती है | सेना की कमान भी सरकार के हाथो में ही होती है ये बात भी जाहिर हो गयी है ,कुछ दिन पहले जनरल विपिन रावत पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात इस लहजे में कह रहे थे जैसे वो सरकार के कोई मंत्री हो !! विपिन रावत अगर हकीकत में सेना को थोड़ी सी भी स्वायत्तता देना चाह रहे है तो उनके मातहत जो श्रीनगर स्थित 15 वी कोर मुख्यालय में बैठे है उनसे बात करते ,सेना पर हो रहे स्थानीय लोगो के हमलो से निजात दिलाने का प्रयास करते , तो उनकी तथाकथित स्वामी भक्ति पर कोई ऊँगली नही उठाता !! सरकार ने संघर्ष विराम किया पर क्या सेना को भी कभी इस तरह की सहूलियत मिलेगी ....शायद नही ??? सरकार की मुहबोली बहन महबूबा कभी नही चाहती की सेना को जम्मू कश्मीर में किसी भी तरह की स्वायत्ता मिले | इस पर भी केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपाना बंद नही कर रही ...मसलन घाटे में रहेगी तो हमारी सेना ही रहेगी !!!
जम्मू कश्मीर में सरकार की उदासीनता
कुछ दिनों से जम्मू कश्मीर को लेकर बहुत से सज्जन अपना अपना पक्ष इस अभासी दुनिया के माध्यम से रख रहे है !!! राष्ट्रवाद के तथाकथित स्वयंभू हितेषी सरकार के झूटे कामो का गुणगान कर रहे है , उन्हें ये बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि मोदी जी सरकार से पहले सेना ने अपने हाथो में चूड़ियाँ नही पहनी थी !!! बल्कि उसका पराक्रम अबके बनस्पति ज्यादा ही था !! ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्युकी सेना ने इससे तीन युद्ध लडे और उनमे अपनी विजय पताका फहराही !!!! लेकिन आज के हालात क्या है इस पर सरकार अपनी झूटी पीठ थपथपा रही है
जम्मू कश्मीर में जितनी बुरी हालत सेना की आज है कभी नही रही !!! हमारे जवान असहनीय होकर खड़े पत्थर खा रहे है इसमें किसी दुसरे दल का कोई दोष नही ....सिर्फ और सिर्फ मोदी जी जिम्मेदार है !!! ऐसी क्या मज़बूरी थी जो महबूबा के साथ सरकार बनाने को बाध्य होना पड़ा !!! कांग्रेस तो चलो आतंकवाद हितेषी होगी लेकिन आतंकवाद मिटा ने से मोदी जी को कांग्रेस नही रोक रही असल वजह मुह बोली बहन महबूबा है ........पहले की सरकारों के समय जब सेना को किसी मुखबिर से या अपने किसी सूत्र से ये पता चल जाता था कि अमुक गाँव में आतंकवादी छुपे है सेना सीधे कार्यवाही करती थी ..मस्जिद के माइक से आवाज लगवा दी जाती कि सेना को खबर मिली है आपके गाँव में आतंकवादी छुपे है सब लोग अपने अपने घरो से बाहर निकल कर एक तरफ आ जाओ !!! जिसमे महिलाये एवं बुजुर्ग एक तरफ बाकि एक तरफ ,,फिर खोज बीन शुरू किसी घर में छुपे होने पर सेना बिस्फोटक लगा कर उस घर को उडा देती काम तमाम !!!! लेकिन अब ऐसा नही है सेना पहले गाँव के नम्बरदार को कहती है फिर वो कल्लेक्ट्रर से आदेश लेगा जब सेना अपनी कार्यवाही करेगी ?? इतने में आतंकवादी गाँव वालो से मिलकर निकल जायेगा दो चार लोगो पैसे देकर सेना पर पत्थर वाजी करवा देगा !!!! अब आप बताओ क्या किसी दुसरे दल को इसका जिम्मेदार ठहराना ठीक है !!! ये हालत बदलने चाहिए सेनाध्यक्ष राजनेतिक भाषा बोलते है सेना की मुलभुत जरुरत के लिए सरकार से क्यू नही कहते ??? मोदी जी अपने पास हाथी जैसे दांत रखते है खाने वाले अलग दिखने वाले अलग उनको जल्दी महबूबा से राजनेतिक तलाक़ लेना चाहिए नही तो वो दिन दूर नही जब महबूबा अपना महबूब पाकिस्तान में भी ढूंढने से गुरेज नही करेगी !!!
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