नवरात्र और उसका महत्व एवं स्वास्थ पर पड़ने वाले प्रभाव के उपाय

नवरात्र की धूम पूरे भारत में नजर आती है और इस दौरान भक्‍त मां के दर्शन के लिए मंद‍िरों में उमड़ते हैं। साथ ही व्रत और व‍िध‍िवत पूजा के साथ उनको प्रसन्‍न करने की कोशिश करते हैं ताकि वे उनकी मनोकामनाएं पूरी करें। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि नवरात्र मनाए क्‍यों जाते हैं और इसका महत्‍व क्‍या है। दरअसल, नवरात्र मनाने के पीछ जो पौराण‍िक कहानी बताई है वो मां दुर्गा की उत्‍पत्‍त‍ि से भी जुड़ी है। 
बता दें क‍ि नवरात्र के नौ द‍िनों में मां दुर्गा के जिन स्वरूपों की पूजा होती है उनमें माता शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि देवी हैं। नवरात्रों में नौ दिनों तक देवी माता जी का विशेष श्रृंगार करना चाहिए। चोला, फूलों की माला, हार और नए कपड़ों से माता जी का श्रृंगार किया जाता है। वहीं नवरात्र में देशी गाय के घी से अखंड ज्योति जलाना मां भगवती को बहुत प्रसन्न करने वाला कार्य होता है
महिषासुर का किया था वध :
मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ आपने भैंस के शरीर से निकल रहे एक मानव आकृति को देखा होगा। इसके हाथों में कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र होते हैं। यह महि‍षासुर है जिसका वर्णन दुर्गासप्तशती के तीसरे अध्याय में है। महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था इसने अपने बल से देवताओं का साम्राज्य छीन लिया और स्वयं इन्द्र बनकर स्वर्ग पर राज करने लगा
लाल चुनरी और माँ भवानी का शेर से सम्बन्ध :
देवतागण ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शरण में गए। महिषासुर को वरदान प्राप्त था कि कुंवारी कन्या के हाथों ही उसका वध होगा। इसलिए तीनों देवों ने मिलकर अन्य देवाताओं की सहायता से एक नारी रूप को प्रकट किया और अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इस देवी ने महिषासुर को युद्घ के लिए ललकारा और रण में महिषासुर का वध किया, इसलिए माता का एक नाम महिषासुरमर्दनी भी है।
देवी ने जिस स्थान पर महिषासुर का वध किया था वह स्थान देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह स्थान हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित नैना देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है।
नैना देवी की कथा  :
पुराणों की कथा के अनुसार यहां पर देवी सती के नैन गिरे थे। इसलिए यह नैनाशक्ति शक्तिपीठ कहलाया। इस स्थान पर शक्तिपीठ होने की जानकारी सबसे पहले एक गुर्जर लड़के को हुई जो हर दिन यहां गाय चराने आता था। इसने देखा कि एक गाय हर दिन नियम स्थान पर जाकर खड़ी हो जाती है और उसके स्तन से दूध की धारा बहने लगती है।
कई दिनों तक ऐसा ही होता रहा तब नैना देवी गुर्जर लड़के के सपने में आई और बताया कि जहां आकर गाय के स्तन से दूध की धारा बहने लगती है वहां मेरा पिण्ड है। मै नैना देवी हूं। गुर्जर लड़के ने यह बात उस समय के राजा बीरचंद को बताई। लड़के की बात सुनकर महाराजा स्वयं उस स्थान पर गए और अद्भुत नजरा देखकर आत्मविभोर हो गए। राजा बीरचंद ने नैना देवी का मंदिर बनवाया।
नौ औषधि जिनमे समाये  है माता के नौ रूप :

  1. प्रथम शैलपुत्री यानी हरड़  : देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। दुर्गाजी के पहले रूप को ‘शैलपुत्री’ के नाम से जाना जाता हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं और कई प्रकार की समस्याओं में काम आने वाली औषधि‍ हरड़ देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। हरड़, जिसे आमतौर से हरितकी के नाम से भी जाना जाता है, यूनानी चिकित्सा पद्धति में इस जड़ी-बूटी का इस्तेमाल एंटी-टॉक्सिन के रूप में कंजक्टीवाइटिस, गैस्ट्रिक समस्‍याओं, पुराने और बार-बार होने वाले बुखार, साइनस, एनीमिया और हिस्टीरिया के इलाज में किया जाता है।
  2. द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानी ब्राह्मी : मां दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी यानी ब्राह्मी का है। इस औषधि को मस्तिष्‍क का टॉनिक कहा जाता है। ब्राह्मी मन, मस्तिष्‍क और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाले के साथ रक्‍त संबंधी समस्‍याओं को दूर करने और और स्वर को मधुर करने में मदद करती है। इसके अलावा यह गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन समस्‍याओं से ग्रस्‍त लोगों को ब्रह्मचारिणी की आराधना करनी चाहिए।
  3. तृतीय चंद्रघंटा यानी चन्दुसूर : मां दुर्गा की तृतीय शक्ति का नाम चंद्रघंटा यानी चन्दुसूर है। नवरात्रि के तीसरे दिन इनका पूजन किया जाता है। यदि आप मोटापे की समस्या से परेशान हैं तो आज मां चंद्रघंटा को चंदुसूर चढ़ाएं। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के जैसा होता है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है। इस पौधे में कई औषधीय गुण हैं। इससे मोटापा दूर होता है। यह शक्ति को बढ़ाने वाली एवं हृदयरोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। इसलिए इस बीमारी से संबंधित लोगों को मां चंद्रघंटा की पूजा और प्रसाद के रूप में चंदुसूर ग्रहण करना चाहिए।
  4. चतुर्थ कुष्माण्डा यानी पेठा : नवरात्र के चौथे दिन मां भगवती दुर्गा के कुष्माण्डा स्‍वरूप की पूजा की जाती है। नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा यानी पेठा है। इसे कुम्हड़ा भी कहा जाता हैं। यह हृदयरोगियों के लिए लाभदायक, कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाला, ठंडक पहुंचाने वाला और मूत्रवर्धक होता है। यह पेट की गड़बड़ियों में भी असरदायक होता है। रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित कर अग्न्याशय को सक्रिय करता है। मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। इन बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पेठा के उपयोग के साथ कुष्माण्डा देवी की आराधना करनी चाहिए।
  5. पंचम स्कंदमाता यानी अलसी : नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है। अलसी में कई सारे महत्वपूर्ण गुण होते हैं। अलसी का रोज सेवन करने से आप कई रोगों से छुटकारा पा सकते हैं। सुपर फूड अलसी में ओमेगा 3 और फाइबर बहुत अधिक मात्रा में होता है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है और यह हमें कई रोगों से लड़ने की शक्ति देता है। कफ प्रकृति और पेट से संबंधित समस्‍याओं से ग्रस्‍त लोगों को स्कंदमाता की आराधना और अलसी का सेवन करना चाहिए।
  6. षष्ठम कात्यायनी यानी मोइया : नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी की उपासना का होता है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। इससे ग्रस्‍त लोगों को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करना चाहिए।
  7. सप्तम कालरात्रि यानी नागदौन : श्री दुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। यह नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती है। मां कालरात्रि की भक्ति से मन का भय तो दूर होता है साथ ही कई बीमारियों से भी मुक्ति मिलती है। जो भक्त मन या मस्तिष्क के किसी रोग से पीडि़त है उसे मां कालरात्रि को नागदौन औषधि अर्पित कर प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करना चाहिए। इस औषधि का इतना प्रभाव होता है कि यदि इसे अपने घर में लगा लिया जाए तो घर के सभी सदस्यों से कई छोटी-छोटी मौसमी बीमारियां हमेशा दूर ही रहेगी।
  8. अष्टम महागौरी यानी तुलसी : नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है और प्रत्येक व्यक्ति इसे औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधीय नाम तुलसी है और इसे घर में लगाकर इसकी पूजा की जाती है। पौराणिक महत्व से अलग तुलसी एक जानी-मानी औषधि भी है, जिसका इस्तेमाल कई बीमारियों में किया जाता है। तुलसी कई प्रकार की होती है और तुलसी के सभी प्रकार रक्त को साफ एवं हृदय रोग का नाश करती है। इस देवी की आराधना सभी को करनी चाहिए।
  9. नवम सिद्धिदात्री यानी शतावरी : मां दुर्गा अपने नौवें स्वरूप में सिद्धिदात्री के नाम से जानी जाती है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। दुर्गा के इस स्‍वरूप को नारायणी या शतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं बी र्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। शतावरी का नियमपूर्वक सेवन करने वाले व्‍यक्ति के सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इसलिए हृदय को बल देने के लिए सिद्धिदात्री देवी की आराधना करनी चाहिए।

             
  • भक्ति और श्रद्धा के इन नौ दिनों के दौरान सेहत का ध्‍यान रखना भी बहुत जरूरी है। अगर आप इस समय दवा से भी परहेज करते हैं तो आप ऊपर बताई  औषधियों से अपने स्वास्थ का ख्याल रख सकते है जिनमे मां दुर्गा का वास होता है।
        
navrat

राष्ट्र ताऊ चौधरी देवीलाल जी एक जीवन परिचय


चौधरी देवीलाल 25 सितम्बर 1914 को तेजा खेड़ा गांव, जिला सिरसा राज्य हरियाणा, भारत में एक जाट हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे। चौधरी देवी लाल राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता सेनानी, हरियाणा राज्य के मुख्यमंत्री और भारत के उप प्रधानमंत्री रहे।
चौधरी देवी लाल ने
अपने स्कूल की दसवीं की पढ़ाई छोड़कर सन् 1929 से ही राजनीतिक गतिविधियों
में भाग लेना शुरू कर दिया था। चौ. देवीलाल ने सन् 1929 में लाहौर में हुए
कांग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशन में एक सच्चे स्वयं सेवक के रूप में भाग लिया
और फिर सन् 1930 में आर्य समाज ने नेता स्वामी केशवानन्द द्वारा बनाई गई
नमक की पुड़िया ख़रीदी, जिसके फलस्वरूप देशी नमक की पुड़िया ख़रीदने पर चौ.
देवीलाल को हाईस्कूल से निकाल दिया गया। इसी घटना से प्रभाविक होकर देवी
लाल जी स्वाधीनता संघर्ष में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे
मुड़कर नहीं देखा। देवी लाल जी ने देश और प्रदेश में चलाए गए सभी
जन-आन्दोलनों एवं स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसके लिए
इनको कई बार जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं।

चौधरी देवी लाल अक्सर कहा करते थे
कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुज़रता है, जब तक ग़रीब किसान,
मज़दूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा, तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने
नहीं हैं। इसलिए वो अक्सर यह दोहराया करते थे- हर खेत को पानी, हर हाथ को
काम, हर तन पे कपड़ा, हर सिर पे मकान, हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी।
चौधरी देवी लाल अक्सर कहा करते थे कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से
होकर गुजरता है, जब तक ग़रीब किसान, मजदूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा,
तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने नहीं हैं। इसलिए वो अक्सर यह दोहराया
करते थे- हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन पे कपड़ा, हर सिर पे मकान,
हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी। अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए चौ.
देवीलाल जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे। 

श्राद्ध पक्ष और उसका महत्त्व



पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है. यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की तिथि में सभी पित्रों के श्राद्ध किए जाते हैं. उसमें विज्ञान यह है कि इन दिनों चंद्रमा अन्य महीनों की अपेक्षा पृथ्वी के पास होता है. इसी कारण उसकी आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी और उसमें अधिष्ठित प्राणियों पर विशेष रूप से पड़ता है. तब जितने सुक्ष्म-शरीरयुक्त जीव चंद्रलोक के ऊपरी भाग में स्थित पितृलोक में जाने के लिए बहुत समय से चल रहे होते हैं या चल पड़े होते हैं, उनका उद्देश्य करके उनके संबंधियों के जरिए प्रदत्त पिंड अपने अन्तर्गत सोम के अंश से उन जीवों को आप्यायित करके उनमें विशिष्ठ शक्ति उत्त्पन्न करके उन्हें शीघ्र और अनायास ही यानि बिना अपनी मदद के ही पितृलोक में प्राप्त करा दिया करते हैं. तब वे पितृ भी उनकी ऐसी सहायता पाकर उन्हें हृदय से समृद्धि और वंशवृद्धि का आर्शीवाद देते हैं.

दिनांक------- तिथि 24 सितंबर- पूर्णमासी श्राद्ध 25 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध 26 सितंबर- द्वितीया श्राद्ध 27 सितंबर- तृतीया श्राद्ध 28 सितंबर- चतुर्थी श्राद्ध 29 सितंबर- पंचमी श्राद्ध 30 सितंबर- षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर- सप्तमी श्राद्ध 2 अक्टूबर- अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर- नवमी श्राद्ध 4 अक्टूबर- दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर- एकदशी श्राद्ध 6 अक्टूबर- द्वादशी श्राद्ध 7 अक्टूबर- त्रयोदशी श्राद्ध 8 अक्टूबर- चतुर्दशी/अमावस्या श्राद्ध 9 अक्टूबर- मातामह श्राद्ध
श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले जिसके लिए श्राद्ध करना है उसकी तिथि का ज्ञान होना जरूरी है. जिस तिथि को मृत्यु हुई हो उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए. लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति होती है कि हमें तिथि पता नहीं होती तो ऐसे में आश्विन अमावस्या का दिन श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ होता है क्योंकि इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है. दूसरी बात यह भी महत्वपूर्ण है कि श्राद्ध करवाया कहां पर जा रहा है. यदि संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए. यदि यह संभव न हो तो घर पर भी इसे किया जा सकता है. जिस दिन श्राद्ध हो उस दिन ब्राह्मणों को भोज करवाना चाहिए.भोजन के बाद दान दक्षिणा देकर भी उन्हें संतुष्ट करें.
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है. यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है. शास्त्रसम्मत मान्यता यही है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए. श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दिया ही जाता है साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सकें तो बहुत पुण्य मिलता है. इसके साथ-साथ गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु-पक्षियों के लिए भी भोजन का एक अंश जरूर डालना चाहिए.

राफेल !!! एक और बोफोर्स ।।

चुनावों से एक साल पूर्व हर बार की भांति देश का पारा धीरे धीरे बढ़ना शुरू । आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू । हाल ही सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच बयानों की तल्खी बढ़ी है ,विपक्षी दल ने हमले तेज कर दिए और अपने चुनावी समर में काम आने वाले नारे के रूप में कुछ शब्दों को अपने दल को फायदा पुहुचाने की गर्ज़ से गढ़ लिया है ।
गली गली में शोर है ,चौकीदार ही चोर है । इस पर भाजपा भी चुनावी समर के लिए अपनी कमर कस रही है ।
ताजा तरीन मामला राफेल लड़ाकू विमान को लेकर गरमाया हुआ है ,रक्षा के क्षेत्र में अपनी कोई उपलब्धि न होने के बाबजूद भी यह काम रिलायंस नेवल को मिला जबकि HAL जैसी सरकारी कम्पनी को इससे हाथ मलते हुए रख दिया गया । वर्तमान लड़ाईया में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने अपने बयान से और खलबली मचा दी । आखिर क्या है ये पूरा मामला इसे समझने की बिंदुबार कोशिश करते है ,

ऑफसेट का सीधा सा मतलब है कि राफेल, भारत की कम्पनी को एक तय हिस्से का काम देगा...ये क्लॉज़ UPA ने लगवाया था HAL के लिए..और इसी क्लॉज़ के सहारे मोदी ने अम्बानी को डाल दिया राफेल सौदे में..

● राफेल में 50% ऑफसेट क्लॉज़ था..यानी डील का 50% इन्वेस्टमेंट भारत मे होगा..ये इन्वेस्टमेंट है, मैन्युफैक्चरिंग नही..तो Make In India की बात आधी अधूरी सी है..

● ये 50% हिस्सा राफेल बनाने तक सीमित नही है..कोई भी डिफेंस का सामान इसमे शामिल किया जा सकता है..

● 50% का 74% भारत से एक्सपोर्ट होना चाहिए..ये बहुत कड़ी शर्त लगाई थी UPA ने..इससे भारत को बड़ी विदेशी मुद्रा मिल सकती थी..

● यानी ऑफसेट के मुताबिक टोटल डील का लगभग 37% भारत में ही बनेगा ये तय था..50% का 74% = 37% (ऊपर का पॉइंट वापस देखिए)

● एक्सपोर्ट का मतलब उसकी क्वालिटी और मूल्य इंटरनेशनल स्टैण्डर्ड के होने चाहिए..उसके बिना एक्सपोर्ट सम्भव नही..यानी HAL विश्वमान्य शस्त्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा था..

● ये काबिलियत भारत मे HAL, L&T, टाटा और महिंद्रा ग्रुप में ही है..पर कांग्रेस ने HAL को चुना था..क्योंकि इसमे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रावधान भी था जो मोदी सरकार ने Dilute किया..

● अगर किसी साल में उस साल के ऑफसेट का काम नही हो पाता तो राफेल को उस मूल्य का 5% जुर्माना भरना पड़ेगा..अब सोचिये राफेल इतना रिस्क अम्बानी पर क्यों लेगा जिसे हवाई जहाज की ABCD नही मालूम?

● पूरी डील लगभग 59 हजार करोड़ की है..असेम्बलिंग भी भारत मे बनना ही माना जायेगा..लगभग 22,000 करोड़ ₹ की विदेशी मुद्रा की कमाई..कितना बड़ा खेल है समझे?

● इसके अलावा ऑफसेट के अनुसार 6% टेक्नोलॉजी शेयरिंग का हिस्सा भी भारत का होना चाहिए..तो 59000 करोड़ का और 6%..यानी 3540 करोड़ ₹ का बोनस HAL को..सोचिये कांग्रेस की दूरदर्शिता..

● ये सरासर झूठ है कि ऑफसेट पार्टनर यानी अंबानी को चुनने में भारत की कोई भूमिका नही है..भारत ने Dassault से डील की फ्रेंच सरकार के माध्यम से..तो Dassault कैसे डील कर सकता है अम्बानी से बिना भारत सरकार के?

लगभग 3 बिलियन € का काम सरकारी कम्पनी को मिलता तो सरकार को भी डिविडेंड मिलता..सरकारी कम्पनी की वैल्यू बढ़ती सो अलग..विदेशी मुद्रा आय, टेक्नोलॉजी जैसे फायदे भी होते..ये किसी प्राइवेट कम्पनी को कोई सरकार क्यों देगी?

ऑफसेट क्लॉज़ लोगो को इससे सहज तरीके से समझाना सम्भव नही..आज के ऑफसेट के बारे में मोदी सरकार कुछ बोलने को तैयार नही है..पर कहानी बना रही है बीजेपी. !!! 
इन तथ्यों से भाजपा मुँह नही मोड़ सकती और न ही अपनी सफाई दे सकती । सरकार में रहकर सरकार या देश को चूना लगाना कैसे जायज है ये प्रश्न भी भाजपा के जी का जंजाल बना हुआ है ।
इतना जरूर है कि ये महज चुनावी स्टंट नही है इसमें बहुत लोगों के हाथ गहराई तक सने है ।जरूरत है इसकी जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए और उसकी निगरानी माननीय उच्चतम न्यायालय करे ,जिससे दूध का दूध और पानी का पानी किया जा सके ।।  इसी उम्मीद में कुछ इसमे नया आयाम लिखा जाए जल्दी न्याय का दरवाजा खुले और देश की जनता को सही जानकारी मिले ।।
आपका
निर्भय सिंह
बडेसरा 

समाज में बेटी बचाओ, बेटी पढाओ के नारे का कडवा सच


तहजीब और तमीज का मतलब क्या है ,ये कहा से आती है ? तालीम का मकसद क्या है ??तालीम या शिक्षा का मूल मकसद मनुष्य के परिपेक्ष में देखा जाये तो चरित्र की एक ईमारत खड़ी करना समझिये !! सामजिक परिवेश में इसे पारवारिक संस्कार से जोडकर देखते है !! यक्ष प्रश्न यह उठता है ? क्या शिक्षित इन्सान चारित्रिक रूप से उतना ही अच्छा होगा जितना किउसे होना चाहिए ??
लेकिन आज के इस पाश्चात प्रभाव वाले दौर में संस्कार दम तोड़ते नजर आ रहे है |ऐसा हुआ क्यों ? इसकी जड कहा है उन्हें तलाश करने की जहमत उठाए कोन !!
moderanisation and westeranisation are not identical concept !!!
हम आधुनिक हो और होने भी चाहिए ,लेकिन पश्चात् प्रभाव को लाद कर अपने मन में मग्न हम ये न सोचे कि समाज में कोई हमारा भी इसी प्रकार का अनुसरण करे !!
द्वतीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में करीब चार से पांच लाख लोग मारे गए थे उनमे ज्यादातर अनेक देशो सैनिको के साथ साथ सामान्य नागरिक भी शामिल थे | जीवित इंसानों में ज्यादा संख्या महिला वर्ग की थी | युद्ध के उपरांत पैदा हुए तत्कालीन हालातो पर सरकारों काम करना शुरू किया , और गाड़ी धीरे धीरे पटरी पर आने लगी | और यूरोप में आर्थिक सम्रद्धि स्थापित होने लगी , आर्थिक सम्रद्धि के अलावा भी बहुत कुछ करना जरुरी था जिससे सामजिक बिषमताए मिटाई जा सके !!!
सामाजिक विषमताए क्या थी ? पहली सबसे बड़ी समस्या थी पुरुष और महिलाओ की संख्या का असमान होना !!! संख्या में महिला ज्यादा थी और पुरुष कम !! इस असमानता ने वहां के सामाजिक ताने बाने को हिला कर रख दिया !! जिन महिलाओ के पति या होने वाले साथी युद्ध में मारे गयें वो जाये तो जाये कहा ?
इस बात को यूरोपियन देशो की सरकारे ज्यादा दिनों तक नजरंदाज नही कर सकी और युद्ध प्रभाबित देशो ने अपने कानूनों में इस तरह की शिथिलता की कि कोई भी महिला अपने मनोरंजन के लिए किसी पुरुष मित्र से सार्वजानिक स्थानों पर मिल सकती है या सीधे शब्दों में कहे तो अपनी शारीरिक भूख शांत कर सकती है !!!
इस तरह इन क्रिया कलापों को होते वहा की युवा पीडी ने देखा और यह एक रिवाज में बदल गया !!
देश स्वतंत्र होने पर हमारे देश के धनाड्य वर्ग का यूरोपियन देशो में आना जाना शुरू हुआ और वहा से कुछ सीखा या न सीखा पर ये बेहूदापन जरुर सीखा !!! कम कपड़े पहनना, सार्वजनिक स्थानों पर आलिंगन करना, बगैरह बगैरह | बाकी का काम हमारे फिल्म उद्योग ने कर दिया और आज के दौर में मोबाइल ने इसमें अपने चार चाँद लगा दिए !!
इसका असर समाज पर इतना पडा कि कोई अंदाजा नही लगा सकता ,कुछ चरित्र से गिरे लोग कब अपने घर की बहु के दीवाने हो जाते हैं पता नही चलता ?? पता तब चलता है जब बेटा असलियत को भांप कर बाप का सर फोड़ देता है !!! ऐसे चरित्र से गिरे इंसान की नजर कब किस बहु बेटी पर पड जाये और कब उसे अपनी हबस का शिकार बना ले कोई नही जनता !! सरकार बेटी बचाओ बेटी पढाओ का नारा दे रही है पर इन बह्शियो से कोई बेटी सुरक्षित नही !! जरुरत है आप अपने बच्चो को समय दो उन्हें उंच नीच वाली हरकतों का ज्ञान कराओ और अपने बच्चे को भरोसा दिलाओ कि हम आपके साथ है तब जाकर हमारे बच्चे इन तथाकथित पढ़े लिखे बह्शियो से सलामत रहेंगे !!!
उम्मीद है आप सब अपने बच्चो के साथ साथी बनकर उनका ख्याल रखेंगे !!
आप से इसी उम्मीद के साथ
आपका
निर्भय सिंह
बडेसरा

भारत की विदेश निति और उसके विफल आयाम

पिछले दो तीन दिन में एक साथ ही पाकिस्तान के अलग अलग तरह के घटनाक्रम हुये है ।
पहला हमारे सैनिक के साथ पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम द्वारा की गई बर्बरता ।।
दूसरा जिनको सिर्फ अपनी मस्ती से मतलब ऐसे लोगो के लिए क्रिकेट के मैदान में पाकिस्तान पर भारत की बड़ी जीत ।।
तीसरा पाकिस्तान के कठपुतली प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा हमारे देश के तथाकथित 56" सीन वाले मजबूत प्रधानमंत्री को भेजा गया विदेश मंत्री स्तरीय बातचीत का न्योता ।।
इन सब बातों से क्या सीख मिली , न पाकिस्तान की बर्बरता बन्द हुई न हम इतने संजीदा हुए कि अपनी सेना के जवान की सहादत के लिए कुछ प्रयत्न करते और ऊपर से हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार बातचीत के लिए राजी ?? सवाल यह उठता है आखिर सरकार चला कोन रहा है ? विदेशनीति के नए परिभाषित आयाम कोन लिख रहा है । हम इतने लचर हो कैसे गए , सेना के हाथ अगर खुले है तो ऐसी कोनसी मजबूरी हो गई कि समाचार पत्रों की सुर्खियों में सेना की मजबूरी सी दिखाई पड़ती है । हमारे जवान 5 किलो की भारी भरकम नकारा INSAS को उठाने को मजबूर क्यों है , हम अभी तक उच्च कोटि हथियार अपने सैनिकों को उपलब्ध क्यों नही करा पाए ।इन प्रश्नों का उत्तर कोई नही दे रहा , लोग क्रिकेट मैच की जीत की ख़ुशी में किसी देशभक्त शहीद के परिवार का रुदन दब जाता है और ऊपर से सरकार पाकिस्तान से बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर शहीदों के जख्मो पर नमक छिड़कने का काम करती है ।मन व्यथित है पुकार रहा है " हे कृष्ण फिर से आओ और अपने सुदर्शन चक्र का प्रताप हमे दिखलाओ ।
इसी उम्मीद में हम सब !!!

भारत की अमेरिकी चक्रव्यूह में कूटनीतिक विफलता

आप सुबह सुबह अच्छी खबर पढ़ने को या सुनने को बेचैन रहते होंगे पर कभी कभी ऐसा भी होता होगा कि आपको अपनी अपेक्षा से कम या ज्यादा बुरी या अच्छी खबर मिले । बात राष्ट्रीय हित की हो तो और भी पेचीदगी भरी होती है ।
काम की बात जल्दी शुरू करते है ।।
 दिल थाम कर पढ़िए–मोदी सरकार ने देश की सम्प्रुभता को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने का पाप कर दिया है।  लेकिन यह विश्लेषण आपको किसी भी अखबार में पढ़ने या टीवी चैनलो पर सुनने को नही मिलेगा।
पिछले दिनों दिल्ली मे भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू की बैठक सम्पन्न हुई है इस बैठक में भारत की तरफ से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भाग लिया अमेरिका के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री भी इस बैठक में भाग लेने के लिए भारत आए थे।
इस बैठक में भारत का जोर मुख्यतः दो बातों पर था पहला ये कि अमेरिकी नाराजगी को देखते हुए भारत ईरान से तेल नहीं खरीदें तो कहां जाए? दूसरा ये कि अमेरिकी आपत्तियों के चलते रूस से मिसाइल क्यों न खरीदें?
भारत अपनी जरुरतों का एक चौथाई तेल ईरान से मंगाता है अभी जो तेल के दाम बढ़ रहे हैं यह दाम ओपेक देश बढ़ा रहे हैं, अमेरिका के दबाव में आकर भारत ईरान से तेल मंगाना लगभग बन्द कर चुका है इसलिए उसे ओपेक देशो की मनमानी सहन करना पड़ रही है और इस कारण पेट्रोल डीजल के दाम भी बढ़ रहे है अमेरिकी दबाव में चाबहार पोर्ट पर भी भारत पीछे हट रहा है।
रूस से किया गया एस 400 मिसाइल प्रणाली का सौदा ‘आखिरी चरण’ में है लेकिन अमेरिका इस सौदे को न करने का दबाव बना रहा है।
लेकिन अमेरिका ने इन दोनों मुद्दों को पूरी तरह से इग्नोर कर दिया अमेरिकी प्रतिनिधि माइक पोम्पियो ने कहा कि भारत और अमेरिका पहली ‘टू प्लस टू’ वार्ता के दौरान बड़े और रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा होगी उन्होंने कहा कि बैठक मुख्य रूप से रूस से मिसाइल रक्षा प्रणाली और ईरान से तेल खरीदने की भारत की योजना पर केन्द्रित नहीं है।
तो फिर चर्चा किस बात पर की गयी ? और बैठक का नतीजा क्या निकला! यह भी समझ लीजिए-
भारत ने अमेरिकी दबाव में आकर इस बैठक में ‘कम्युनिकेशन कंपेटिबिलिटी ऐंड सिक्युरिटी अग्रीमेंट’ (कॉमकासा) पर हस्ताक्षर कर दिए है ओर मोदी सरकार की मांगों पर उसे ठेंगा दिखा दिया गया है।
अब यह कॉमकसा समझौता क्या है यह जानना बेहद जरूरी है क्योंकि यह भारत की सम्प्रुभता को गिरवी रखने वाले समझौतों की दूसरी कड़ी है। किसी देश पर अपना सम्पूर्ण प्रभाव जमाने के लिए अमेरिका तीन रक्षा समझौतों को आवश्यक मानता है इसी में से एक समझौता है कॉमकासा (COMCASA) जो इस बैठक में किया गयाष
दो अन्य समझौते हैंः लेमोआ यानी लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट (Logistics Exchange Memorandum of Agreement :LEMOA) और ‘बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट फॉर जियोस्पपेटियल को-ऑपरेशन यानी ‘बेका’ (Basic Exchange and Cooperation Agreement for Geo-spatial Cooperation: BECA)
लेमोआ पर मोदी सरकार अमेरिका से अगस्त 2016 में समझौता कर चुकी है जिसके तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल कर सकती हैं तीसरा समझौता ‘बेका’ पर भी वार्ता की शुरुआत हो चुकी हैं
लेमाओ समझौते के तहत अमरीका जब चाहे तब हिंदुस्तान के अंदर अपनी फौजों को तैनात कर सकता है। भारत के परिपेक्ष्य में यह बहुत गलत समझोता था अमरीकी सशस्त्र बलों को भारतीय नौसैनिक बंदरगाहों तथा हवाई अड्डो का अपने युद्घ-पोतों, जंगी जहाजों की सर्विसिंग, तेल भराई तथा उनके रख-रखाव के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत देने का मतलब है हमारे देश द्वारा अब तक अपनाए जा रहे स्वतंत्र रुख से और किसी सैन्य गठजोड़ में शामिल न होने की उसकी नीति से पूरी तरह से हट जाना।
लेकिन कॉमकसा का समझौता तो ओर अधिक खतरनाक है इसे पहले सिसमोआ (CISMOA) के नाम से जाना जाता था इस पर दस्तखत करने के बाद अमेरिका अपनी कम्पनियों द्वारा सप्लाई किए गए हथियारों का समय समय पर निरीक्षण करने का हकदार होगा। यानी वह जब चाहे मांग कर सकता है कि जिन हथियारों पर अमेरिकी संचार उपकरण लगे हैं वह उनकी जांच करेगा यह समझौता दोनों देशों के सैन्य बलों के संचार नैटवर्कों का आपस में जोड़ देगा भारत की कोई तकनीक सीक्रेट नही रह जाएगी।
यूपीए सरकार पर भी इन दोनों समझौतों को मानने का दबाव बनाया गया था लेकिन मनमोहन सरकार ने इस पर दस्तखत नहीं किए थे, तत्कालीन रक्षा मंत्री, ए के अंथनी ने इस संबंध में स्पष्ट रुख अपनाया था।
इसे मोदी समर्थक भारत की कूटनीति कहेंगे लेकिन LEMOA ओर COMCASA पर हस्ताक्षर भारत की कूटनीतिक विफलता है क्योंकि किसी शक्तिशाली देश जैसे अमरीका की गोद में बैठ जाने को कूटनीति नहीं कहते, कूटनीति का अर्थ होता है सभी देशों के साथ अच्छे सम्बंध बना के हर देश का अपने सामरिक हितों के पक्ष में इस्तेमाल करना। LEMOA ओर COMCASA जैसे किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर के अमरीका जैसे किसी शक्तिशाली देश की सेना को अपनी सरज़मी पर बुलाने को आत्मसर्पण करना बोलते हैं, कूटनीति नही।
स्पष्ट है कि भारतीय हितो से समझौता कर मोदी सरकार अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों की गोदी में खेलने को तैयार किस दबाब में हुई ये जानने की न तो कोई कोशिश कर रहा है, न किसी ने जरूरत समझी ।हमने अपने परम्परागत साथी रूस को दरकिनार करते हुए साम्रज्य वादी अमेरिका को गले क्यों लगाया इसका कोई दीर्घकालिक कारण नजर नही आता ।
भगवान हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार को सद्बुद्धि दे ।।

सरकार की ढुल मुल नीति और उसके परिणाम



हर दिन रह बीमार हमें तेरी सेहत से क्या लेना !!
56 " इंची कहा गया नित मरे हमारी सेना !! 
करदो नाटक बंद तुम्हारी बहुत हुयी नौटंकी ,!
करो दिखावा बंद झूटी बात तुम्हारे " मन की "!! 
तुम क्या जानो दर्द सियासत में बेदर्द मुखोंटे ,!
बनकर ईमानदार तुमने दाम कमाए मोटे !!
वो ही पाकिस्तान तुम्हे अब गुड सा हो गया मीठा !
करी बुराई उसकी हर दिन तभी चुनाव जीता !!
सेना मरती रोज बने हो तुम ऐसे निर्मोही !
रुदन करत माँ भारती रात दिना न सोई !!
15 दिन का पुत्र देख जब पिता को अग्नि लगाये !
धरती फटती देख द्रश्य जब पत्नी फूल चढ़ाये !!
# देश के शहीदों को शत शत नमन

लोकत्रंत्र को चुनोती

देश ने अपने लोकतान्त्रिक इतिहास में बहुत उतार चढाव देखे है ,कभी बहुत मजबूत लोकतंत्र और कभी बहुत भयावह स्थिति वाला आपातकाल ,एक तरह से आप उसे हाब्स का कटा हुआ सर वाला लोकतंत्र कह सकते है !! लेकिन इसी दौर के कुछ चुनिन्दा तेज तर्रार नेताओ के योगदान को भी नही भुलाया जा सकता ,उन्ही के प्रयासों से वो राजनैतिक अस्थिरता का दौर भी जाता रहा | जयप्रकाश नारायण ,के आन्दोलन को कोई कैसे भूल सकता है | मोरारजी देसाईं ,चौधरी चरण सिंह , चन्द्रशेखर ,अटल विहारी बाजपेयी ये कांग्रेस अभिनीत सरकार से मुखर थे ,इन सभी को जेलों में रहना पड़ा !!लेकिन सरकार के विरोध के बाबजूद भी ये राजनेता अपने वजूद को बचाने  में कामयाब हो पाए !! उसका एक कारण यह भी था कि उनका राजनैतिक आधार बहुत मजबूत था ,जिसका आधार मजबूत हो और उसकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा न हो ऐसा कैसे हो सकता है ? इसी के  फलस्वरूप आगे सरकारों का पतन होता रहा !! 1977 के हुए आम चुनावो में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पडा | मोरारजी देसाई जी के नेतत्व में सरकार का गठन हुआ , लेकिन मोरारजी यही पर एक गलती कर गए ? उन्होंने तत्कालीन रक्षामंत्री जगजीवनराम को उपप्रधानमन्त्री बना दिया ,इस पर बबाल मचना लाजिमी था !!देसाई जी की प्रष्ठभूमि गैर कांग्रेसी नही थी , सत्ता संतुलन में भी उनका वही कांग्रेस पुट नजर आया | उन्होंने दलित और स्वर्ण का मेल अपनी सरकार में रखा , लेकिन अपनी तेजतर्रार छवि और किसान आन्दोलन के अगवा चौधरी चरण सिंह को जगजीवन राम का उप् प्रधानमन्त्री बनना नागवार लगा, और अपनी नाराजगी से देसाई जी को अवगत कराया  | मजबूरन देसाई जी को एक और उप प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करनी पड़ी और यही फिर आगे चल कर उनकी सरकार के पतन के कारणों में से एक भी था !! मैं ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ कि पुराने राजनेताओ की अवधारणा आज भी जिन्दा है ,मह्त्वाकाक्षा उतनी ही है ,लेकिन अगर कम हुआ है तो वो है जनता के प्रति उनकी जवाब देही ,देश के प्रति उनका मोह !!! झूठ राजनैतिक जीवन का एक हिस्सा होता है इसमें कोई शक नही ,लेकिन तब और अब में बहुत फर्क है बढ़ते तकनिकी युग में हमारे नेता भी उतने ही हटधर्मी हो गए है कि कोई शार्टकट लेने से नही चुकते !!! जनता आज भी इन फरेबियो के जाल में फस जाती है | सरकार में बैठे लोग अपने फायदे के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते है , और पहले भी ऐसा करते रहे है लोग ,लेकिन अब जो हथकंडे अपनाये जा रहे है वो छुप नही पाते ,आम जन की नजरों में आने पर सरकार की छीछालेदर होना लाजिमी है ,पहले प्रिंट मीडिया में किसी खबर को छपने पर ही हंगामा हो जाता था , लेकिन अब तो हर घंटे पर नई खबर आपको देखने को मिलेगी , इससे फायदा कम नुकसान ज्यादा हुआ है , भरोसा टुटा है नैतिकता का पतन तो हुआ ही है जवाबदेही भी उतनी नही है ,क्यूंकि कोई भी खबर एक दिन से ज्यादा हंगामा करती नही , तो लोग एक दो दिन चुप रह कर ही समय निकालना बेहतर समझ लेते है और जैसे ही हंगामा खत्म वही ढाक के पात वाली कहानी होती है !!!कहने का मतलब लोकत्रंत्र सुद्र्ण नही हुआ है ,अभी नए सिरे से खतरे की घंटी बजनी शुरू हो गयी है ,प्रवर्तन निदेशालय और सी बी आई के बढ़ते दखल  जलती आग में घी का काम कर रही है ,जरुरत है सरकार के चारो स्तंभों को मजबूत बनाया जाये साथ ही बिपक्ष भी अपनी भूमिका न्याय पूर्ण तरीके से निभाए जिससे जनता में भरोसा जगे और जनता इसे पूर्ण रूप से स्वीकार करे !!!
केंद्र सरकार के चार साल पुरे होने पर सरकार के चाहने वाले और विरोधी मीडिया द्वारा किये गए एक सर्वे पर अपनी अपनी बात रख रहे है |, सर्वे में बताया गया है कि आने वाले 2019 के चुनावो में  प्रधानमन्त्री मोदी जी जोड़ तोड़ करके सरकार बनायेंगे | 2014 के चुनावो के समय भाजपा को 45 प्रतिशत लोगो ने मत दिया अब यह आंकड़ा घट कर 37 प्रतिशत हो गया है !!! मतलब बहुमत से सिर्फ 2 सीटें ज्यादा ? अब सर्वे वाली एजेंसी पर ऐसा कोनसा थर्मामीटर है जो अभी से नाप दिया कि 2 सीट ही  ज्यादा मिलेंगी !! सर्वे एजेंसी किसी के कहने पर ही  जनता का मूड जानने की कोशिश करती है , इनकी विश्वसनीयता भी सवालो के घेरे में रहती है !इनकी भविष्यवाणी कभी सच नही हुयी | सर्वे कराने की जरुरत क्यूँ  पड़ी , इसका जवाब गिने चुने कार्पोरेट घरानों के पास ही हो सकता है |उनके अपनी पसंदीदा सरकारों से हित जुड़े होते है ? अदानी ,अम्बानी ,रामदेव जो कि पिछली सरकारों में अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहे थे ,इस सरकार में सहज महसूस कर रहे है | अदानी के पॉवर प्रोजेक्ट को सरकार ने लोन उपलब्ध कराया और इसी सरकार के समय उनका मुनाफा कई गुना बढ गया , यही हाल कमोवेश पतंजली वाले बाबा  रामदेव का है पिछली सरकार के समय उनको हर महीने किसी न किसी तरह की जाँच से उनके  उत्पादों को गुजरना पड़ रहा था !!! अब जाकर उन्होंने राहत की सांस् ली है ? अम्बानी भी अपना जिओ प्रोजेक्ट इसी सरकार के समय लांच कर चुके है और अरबो रूपए का मुनाफा कमा चुके है !!कर्पोरेट घराने पिछले दरवाजे से सरकार की नीतिया तय करते है | सरकार में रहने वाली पार्टिया  इसके बदले अपने खर्चे के लिए चंदे के रूप में  कार्पोरेट घरानों से मोटी रकम बसूल करती है | अब सरकारों को खुद अपने कामो का लेखा जोखा भी प्राइवेट कम्पनियों से करवाना पड़ता है | सरकार में रहने वाली पार्टिया किसी नीति विशेष के तहत शासन नही करती ,उनकी नीतिया काल खंड के हिसाब से बदल जाती है | पार्टियों का अपनी नीतियों के लेकर कोई ऐसा मानक नही होता कि उस पर सतत वो एक जैसा रुख अख्तियार कर सके !! भाजपा और कांग्रेस की नीतियाँ कमोवेश एक जैसी है !! कोई खास अंतर नही है |सरकार बनाने से लेकर सरकार चलाने तक एक जैसा ही तरीका है | कांग्रेस पर एक परिवार विशेष का प्रभाव रहता है , और दूसरी तरफ भाजपा पर संघ की नीतियों को लागु करने का !! अब प्रश्न एक खड़ा होता है कि भाजपा  पिछले चार  साल से सरकार में है , चुनावो पूर्व किये गए वायदों की फेहरिस्त उनकी बहुत लम्बी है | राममन्दिर, धारा 370, समान नागरिक आचार संहिता , 15 लाख का हर किसी के खाते वाली बात तो पार्टी सरेआम जुमला मान चुकी है , गरीबी उन्मूलन , रोजगार , किसानो की आय दोगुनी करने जैसे उनके मुलभुत वायदों का क्या हुआ ??  सरकार नोट बंदी और पाकिस्तान के विरुद्ध की गयी सर्जिकल स्ट्राइक पर अपनी पीठ थपथपाना नही भूलती !! इन दोनों मसलो पर सरकार को कोई कुटनीतिक समस्या का सामना करना नही पड़ा !! न तो संयुक्त राष्ट्र संघ में इसके लिए कोई पैरवी करनी पड़ी न ही अंतराष्टीय जगत की नाराजगी झेलनी पड़ी ??  नोट बंदी अभी तक अपनी असफलता की वजह से आज भी लोगो के जहन से उतरी नही है !! सेना की बात की जाये तो सेना समय समय पर इस तरह की कार्यवाही को अंजाम देती रहती है | वो बात अलग है कि सरकार ने इसे अपने पक्ष में इस तरह भुनाया जैसे प्रधानमन्त्री रण की लड़ाई जीत कर आये हो ? 2014 से पहले सेना ने चूड़ियाँ नही पहनी थी ,सेना ने तो अब तक जितनी लड़ाई लड़ी थी वो इस सरकार के कार्यकाल से पहले ही लड़ चुकी थी !!! सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए बहुत झूटे आंकड़ो का सहारा ले रही है , वास्तविकता से कोई लेना देना नही है | सरकार अभी तक देखा जाये तो हर मोर्चे पर बिफल रही है !! अटल आडवानी जी के जमाने की राजधर्म की नीति को दरकिनार करके तथाकथित कूटनीति को अपना लिया है !!भाजपा को मशीन बना दिया है ,जैसा बहुमत 2014 में मिला ऐसा फिर मिलेगा लगता नही ....चाहे कोई सर्वे करा लो या कोई और जुमला तैयार कर लो !!!
मनुष्य एक सामजिक प्राणी है और जीवन जीने की कला उसे बखूबी आती है | अपनी सहूलियत के हिसाब से मनुष्य अपने आप में कई तरह से परिवर्तन स्वयं कर लेता है ! हाल ही के  दिनों में देश में राजनैतिक उठा पटक देखने को मिली , राष्ट्रिय स्तर के दोनों दलों ने अपना अपना वजूद कायम रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया |आप भी अंदाजा लगा रहे होंगे कि बात कहा की चल रही है , जी हा आपका कयास बिलकुल निशाने पर है !!! किस्सा कर्नाटक का है , भाजपा को अति महत्वाकांक्षा ले डूबी | भाजपा के सिपहसलार रेड्डी बंधुओ की तिकडम काम नही आई !! येदुरप्पा से भी जिस तरह के करिश्मे की उम्मीद थी ऐसा वो कर नही पाए ,बाकि लोग जैसे अनंत कुमार ,करन्द्ज्लाने आदि कोई खास उपयोगी हुआ नही !! उधर कांग्रेस के पास राज्य खोने के अलावा कोई चारा नही था !!सिद्धारमैया अपने लिंगायत वाले फार्मूले में खुद ही फस गए थे ,उनके भाजपा समकक्षो ने लिंगायतो को टिकट देकर उनको तक़रीबन फेल कर दिया था !!! लेकिन इसके बाद भी उनका प्रदर्शन ऐसा नही था कि पार्टी उन्हें डाट फटकार लगाये या उनके काम को लेकर नाखुशी जाहिर करे !! इसका एक सीधा सा कारण यही था कि भाजपा की देशव्यापी लहर और व्रहत प्रचार तंत्र के होने के बाद भी वो भाजपा को सत्ता की दहलीज पर जाने से रोकने में कुछ हद तक सफल रहे है !!
सत्ता में आंकड़ो का बड़ा महत्व होता है  78 सीटे जीत कर वो अपने वजूद को कुछ हद तक दोड़ में शामिल रहने में कामयाब रहे  ,अगर इतनी सीटें कांग्रेस नही जीतती तो भाजपा निश्चित सरकार बना देती ,कुमारस्वामी प्लान धरा का धरा रह जाता ,हालंकि सिद्धारमैया अपने आपको अंतिम दिन तक कांग्रेस को सत्ता के करीब देख रहे थे ,चुनाव परिणाम जैसे ही आना शुरू हुआ राजनैतिक दलों में हलचल मचना लाजिमी था ,लेकिन "दूध का जला छाछ को फूंक फूंक कर पिता है "  इस पर कांग्रेस ने अपने दो धुरंधरों ,अशोक गहलोत और गुलाम नबी आजाद को तुरंत बंगलुरु भेज दिया ,और उन्होंने तमाम तरह की अटकलों को ठेंगा दिखाते हुए कांग्रेस समर्थित सरकार बनाने में अपना पूरा पूरा योगदान दिया !!! इस सबके बीच भाजपा में कुछ विरोधी स्वर भी उठे ,हाशिये पर जा चुके यशवंत सिन्हा, धवन , और भी गुपचुप तरीके से अपनी पार्टी के कर्नाटक में अपनाये जा रहे तरीके से नाखुश दिखे ...मामला सुप्रीम कौर्ट गया और भाजपा जो जोड़ तोड़ पर आमादा थी अपने आप को पंगु समझने लगी !!! और फिर एक अप्रत्यासित चमत्कार की आस में सदन में बहुमत साबित करने पर अडी रही और अंत में हार का अंदेशा होने पर येदुरप्पा ने अपना स्तीफा दे दिया ,अमित शाह ,नरेन्द्र मोदी और नौ साल तक नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल  के समय मंत्रिमंडल में रहने बजुभई वाला भी चाह कर भी कुछ नही कर सके | इतनी हार का अंदेशा किसी को भी नही था ,लेकिन हुयी , अब आगे तीन बड़े राज्यों में चुनाव आने वाले है ,कर्नाटक के नाटक के बाद बिपक्ष अपनी अपनी अलग अलग ही सही लेकिन एक साथ चुनाव रूपी  एपिसोड में भूमिका निभाएगा जरुर ,ऐसे में भाजपा का चिंतित होना निश्चित है कांग्रेस के पास खोने को कुछ भी नही लेकिन भाजपा को होने वाले नुक्सान का आंकलन वो कर चुकी है ,ऐसे में अमित शाह और प्रधान मंत्री दोनों हो मिलकर इस परेशानी से पार नही पा सकते , उनके द्वारा दरकिनार किये गए अपने पुराने दिग्गजों को भी साथ में लेना पड़ेगा और तभी चुनाव रूपी समर में वो कुछ कर सकने की स्थिति में होगी वरना तीनो राज्यों में ज्यादा नही तो हालात कर्नाटक जैसे होंगे ,भाजपा सत्ता तक पुहुच कर भी नही पुहुचेगी !!!  
आज के प्रतिस्पर्धा के दौर में इंसान अपने हित के हिसाब से कार्य करता है !! ये क्रिया कलाप सब तरह के होते है ,वो राजनैतिक और सामाजिक आर्थिक सब तरह से अपने अपने स्वार्थ तलाश करता रहता है !! सामाजिक और राजनैतिक दायरा थोडा  बड़ा होता है बनस्पति आर्थिक दायरे के ...आर्थिक दायरा अपनत्व से जुडा होता है पर उसका आधार या सामाजिक होगा या फिर राजनैतिक .इंसान अपने जीवन की पूर्ति के लिए धनार्जन करता रहता है अब उन्हें रास्ता किसी भी तरह का अख्तियार करना पड़े इस बात से खास लगाव नही होता !!! कुछ लोग सामाजिक स्तर  पर इतने मजबूत होते है, कि वो कुछ भी करे लोग उनके किये को गलत मानते ही नही ! समाज के अपने मानदंड है हर इंसान उसमे खरा उतरे ऐसा कतई नही | फिर भी दावे कान कही न कही वो बुराई के पात्र बनते जरुर है . ऐसा ही कमोवेश राजनैतिक जीवन में भी होता है , लेकिन समय के हिसाब  लोगो ने इसे अपने अनुरूप बनाने की असफल  कोशिश करते रहते है !!! जहा जैसी बारिश बैसी छतरी ... राजनैतिक नियुक्ति इसी आधार पर होती है लोग उन्हें ही अपना प्रतिनिधित्व सोंपते है जो कालान्तर में उन्हें आर्थिक या सामजिक तौर पर फायदेमंद हो !!! हमारे देश में संसदीय  लोकतांत्रिक प्रणाली आधारित संघीय सरकार है !! राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमन्त्री शासनाध्यक्ष होता है   राष्ट्रपति जी के नाम पर शासन चलता है .असल में रबर की मुहर ही समझा जाता है ...कुछ राष्ट्रपतियों को छोड़ दिया जाये तो सब आज तक रबर की मुहर ही साबित हुये है ,अपने राजनैतिक दल के प्रति ही वो ज्यादा जवाब देह रहे है !! केंद्र स्तर पर जो भूमिका राष्ट्रपति की है राज्य में वही काम राज्यपाल का है ..लेकिन वो संघीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में ही ज्यादातर अपनी भूमिका निभाता है ....लेकिन अभी के दौर में राज्यपालों की भूमिका संदेह पूर्ण नजर आती है संबिधान के अनुच्छेद 163– राज्यपाल की शक्तियां, राज्यपाल में दो प्रकार की शक्तिया निहित होती है| 1- मुख्यमंत्री(मंरिपरिषद) के सलाह से प्रयोग करने वाली. 2- स्वविवेक के आधार पर प्रयोग की जाने वाली शक्तियां  !!! ये जो  दूसरी वाली शक्ति स्वविवेक वाली बहुत ज्यादा प्रयोग के तौर पर लाई गयी है और इसका दूरगामी दुस्प्रभाव देखने को मिला है !!! राज्यों में होने वाले चुनावो में राजभवन संघीय सरकारों के पार्टी द्फ्तर में तब्दील हो जाते है !!! संघीय सरकार      किसी भी तरीके से अपने को फायदे पुहुचाने वाले जतन करने से नही चूकती !! इसका सबसे बड़ा कारण संघीय सरकारों द्वारा अपनी पार्टी विशेष के  लिए पैसे का इन्त्जाम इन राज्यो से ही होता है और यही कारण है सरकारे अनेतिक काम करने से नही चूकती !!!
सभी धर्मों में अपने आराध्य की पूजा उपासना, व्रत उपवास के लिये कुछ विशेष त्यौहार मनाये जाते हैं। ताकि रोजमर्रा के कामों को करते हुए, घर-गृहस्थी में लीन रहते हुए बंदे को याद रहे कि यह जिंदगी उस खुदा की नेमत है, जिसे तू रोजी-रोटी के चक्कर में भुला बैठा है, चल कुछ समय उसकी इबादत के लिये निकाल ले ताकि खुदा का रहम ओ करम तुझ पर बना रहे | बात रहमो करम की आयी है तो उस पर नजर करने की जरुरत है ? जो अपने परवरदिगार की पूजा करेगा उसे जन्नत मिलेगी इसमें कोई शक नही है ..लेकिन हाल ही अपनी सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में प्रस्तावित इकतरफा  युद्ध विराम से पाक महीने रमजान का कितना सम्बन्ध है ये सरकार में बैठे ज्यादा जानकारो की सोच पर आधारित है !! पर एक बात सरकार ने स्वीकार करली है कि आतंकवाद एक व्यापर सा हो गया है इसमें भी समय रहते उतार चढाव् हो सकता है | केंद्र सरकार अपने आपको राष्ट्रवाद की पैरोकार मानती है पर ये राष्ट्रवाद महबूबा मुफ़्ती के सामने घुटने टेक देता है ये समझ से परे है | कुछ दिन पहले महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर की बिधान सभा में प्रधान मंत्री की तारीफों के पुल बांधती है और उन्ही की अनुशंषा पर केंद्र सरकार एक तरफ़ा संघर्ष विराम की घोषणा   कर देती है !!! इस बात के क्या मायने निकाले  जाए, क्या आतंकवादी नवरात्र के दिनों में संघर्ष विराम करेंगे ? या फिर तथाकथित सरकार भी सेना को सिर्फ और सिर्फ उपभोग की ही वस्तु समझती है | सेना की कमान भी सरकार के हाथो में ही होती है ये बात भी जाहिर हो गयी है ,कुछ दिन पहले जनरल विपिन रावत पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात इस लहजे में कह रहे थे जैसे वो सरकार के कोई मंत्री हो !! विपिन रावत अगर हकीकत में सेना को थोड़ी सी भी स्वायत्तता देना चाह रहे है तो उनके मातहत जो श्रीनगर स्थित 15 वी कोर मुख्यालय में बैठे है उनसे बात करते ,सेना पर हो रहे स्थानीय लोगो के हमलो से निजात दिलाने का प्रयास करते , तो उनकी तथाकथित स्वामी भक्ति पर कोई ऊँगली नही उठाता !! सरकार ने संघर्ष विराम  किया पर क्या सेना को भी कभी इस तरह की सहूलियत मिलेगी ....शायद नही ???  सरकार की मुहबोली बहन महबूबा कभी नही चाहती की सेना को जम्मू कश्मीर में किसी भी तरह की स्वायत्ता मिले | इस पर भी केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपाना बंद नही कर रही ...मसलन घाटे में रहेगी तो हमारी सेना ही रहेगी !!! 

जम्मू कश्मीर में सरकार की उदासीनता

कुछ दिनों से जम्मू कश्मीर को लेकर बहुत से सज्जन अपना अपना पक्ष इस अभासी दुनिया के माध्यम से रख रहे है !!! राष्ट्रवाद के तथाकथित स्वयंभू हितेषी सरकार के झूटे कामो का गुणगान कर रहे है , उन्हें ये बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि मोदी जी सरकार से पहले सेना ने अपने हाथो में चूड़ियाँ नही पहनी थी !!! बल्कि उसका पराक्रम अबके बनस्पति ज्यादा ही था !! ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्युकी सेना ने इससे तीन युद्ध लडे और उनमे अपनी विजय पताका फहराही !!!! लेकिन आज के हालात क्या है इस पर सरकार अपनी झूटी पीठ थपथपा रही है
जम्मू कश्मीर में जितनी बुरी हालत सेना की आज है कभी नही रही !!! हमारे जवान असहनीय होकर खड़े पत्थर खा रहे है इसमें किसी दुसरे दल का कोई दोष नही ....सिर्फ और सिर्फ मोदी जी जिम्मेदार है !!! ऐसी क्या मज़बूरी थी जो महबूबा के साथ सरकार बनाने को बाध्य होना पड़ा !!! कांग्रेस तो चलो आतंकवाद हितेषी होगी लेकिन आतंकवाद मिटा ने से मोदी जी को कांग्रेस नही रोक रही असल वजह मुह बोली बहन महबूबा है ........पहले की सरकारों के समय जब सेना को किसी मुखबिर से या अपने किसी सूत्र से ये पता चल जाता था कि अमुक गाँव में आतंकवादी छुपे है सेना सीधे कार्यवाही करती थी ..मस्जिद के माइक से आवाज लगवा दी जाती कि सेना को खबर मिली है आपके गाँव में आतंकवादी छुपे है सब लोग अपने अपने घरो से बाहर निकल कर एक तरफ आ जाओ !!! जिसमे महिलाये एवं बुजुर्ग एक तरफ बाकि एक तरफ ,,फिर खोज बीन शुरू किसी घर में छुपे होने पर सेना बिस्फोटक लगा कर उस घर को उडा देती काम तमाम !!!! लेकिन अब ऐसा नही है सेना पहले गाँव के नम्बरदार को कहती है फिर वो कल्लेक्ट्रर से आदेश लेगा जब सेना अपनी कार्यवाही करेगी ?? इतने में आतंकवादी गाँव वालो से मिलकर निकल जायेगा दो चार लोगो पैसे देकर सेना पर पत्थर वाजी करवा देगा !!!! अब आप बताओ क्या किसी दुसरे दल को इसका जिम्मेदार ठहराना ठीक है !!! ये हालत बदलने चाहिए सेनाध्यक्ष राजनेतिक भाषा बोलते है सेना की मुलभुत जरुरत के लिए सरकार से क्यू नही कहते ??? मोदी जी अपने पास हाथी जैसे दांत रखते है खाने वाले अलग दिखने वाले अलग उनको जल्दी महबूबा से राजनेतिक तलाक़ लेना चाहिए नही तो वो दिन दूर नही जब महबूबा अपना महबूब पाकिस्तान में भी ढूंढने से गुरेज नही करेगी !!!

बदलता राजनैतिक परिद्रश्य

सामाजिक न्याय और रामराज्य की परिकल्पना के निहितार्थ सरकारे लोकलुभावन योजनाओ की रुपरेखा बनाती तो है , लेकिन असल में उनके क्रियान्वयन  के उपर जोर होता नही | निर्वाचन से पूर्व सरकारे ऐसे वायदे भी कर जाती है जिनका वास्तविकता से कोई सरोकार नही होता | चुनाव विशेषज्ञ लोकलुभावन नारों को ऐसे गढते है जैसे सब कुछ अभी बदलने वाला है ?? चुनाव पूर्व और बाद  के समीकरणों को एक रूप में नही तोला जा सकता | अपनी अपनी सोच और परिकल्पना के आधार पर राजनेतिक पार्टिया लोगो के बीच जाती है !!! काफी दशक पूर्व जब सायकिल या पैदल चलकर लोग अपना प्रचार करते थे ,कुछ नये नारे सुनने को  मिलते थे जिनमे पार्टी विशेष की बुराई छिपी होती थी ,व्यक्तिगत आक्षेप नही होता था "बीडी में तम्बाकू है ...कांग्रेस वाला डाकू है ?? कालांतर में फिर माहोल बदलने लगा और आरोप जातिगत हो गए ,तिलक तराजू और तलवार ....इनको मारो जुते चार !!!! अब दोनों नारों को देखा जाये तो अपनी अपनी पार्टी को फायदा पुहुचाने को लेकर इनको गढ़ा गया  पर दोनों के द्वारा दिया गया संदेश अलग अलग है | फिर धार्मिक कट्टरता का समावेश होने लगा "गर भारत में रहना होगा ...वन्देमातरम कहना होगा , ||| सौगंध राम की खाते है ..हम मंदिर वही बनायेंगे  | नारों का चुनावो से तो सीधा सम्बन्ध है पर इसका व्यवहारिक रूप से किसी पर कितना असर पड़ेगा ये कहना बहुत मुश्किल है | धीरे धीरे करके कालखंड के आधार पर चुनावी बिसात कुछ अलग अलग करके बिछनी सुरु हो गयी | सत्ता के प्रति लोगो का झुकाव, गिरती साख ,और ओछी मानसिकता ने सारी दिशा ही बदल दी है | आज के ज़माने में यथार्त कम और बनावटी पन ज्यादा है | जनता सजग है पर उसे ठेगा दिखने वाले पहले से ज्यादा शातिर है | हर तरफ से जनता को  ठगने में लग हुए है ?? तभी तो बढती तकनीक और जागरूकता के वावजूद राजनैतिक दलों के झूठ पर लगाम  लगाना मुश्किल हो रहा है . जब उनसे इस बारे में पूछा भी जाता है तो अपने द्वारा किया हुआ वायदा महज एक जुमला प्रतीत होता है और इसी का बहाना करके वो अपना पीछा जनता से छुड़ा लेते है |  

किसान का भविष्य

सूखे में बाढ़ में फसलें थी धान की |
फिर भी अमीन लाये नोटिस लगान की ||
पत्रे में लग्न खूब थे पंडित भी कम न थे ,
फिर भी कुंवारी रह गयी बेटी किसान की ||

आज की तत्कालिक परिस्थिति  किसान के बारे में  उपरोक्त पंक्तियाँ बखूबी बयां करती है , फोरी तौर पर किसान को कही से कोई राहत मिलती नजर नही आ रही | उपर से बेमोसमी बारिस ने और उसकी दुबिधा और  बढा दी है | सरकार पर कागजी आंकड़े इतने सारे है कि दिखाने को देश बिकसित और किसान बिकासशील नजर आता है , जबकि हकीकत इससे कोसो दूर है | किसान को सहूलियत के नाम पर सरकार के पास कोई अल्लादीन का चिराग नही है जो कहा और हो गया | सरकार योजना बनाएगी फिर उनका क्रियान्वयन होगा ? ऐसा होने में न जाने कितने साल बीत जायेंगे | जरुरत है स्थाई समाधान की  , जो होता नजर नही आता | किसान की जीविका कृषि पर और वो जमीन पर ही संभव है ,आज तक ऐसी कोई तकनीक नही आयी कि किसी प्रकार की खेती बिना जमीन के संभव हो सके | जमीनी गणित भी किसान के हक में नही है ... ज्यादा लागत भरी फसल और उसका कम उत्पादन ऐसे में अपना घाटा कैसे संतुलित किया जाये ?ऐसे में किसान को फसली ऋण लेने को ही मजबूर होना पड़ता है | ऋण लेने के दो  ही रास्ते है ...पहला किसी जानकारी वाले साहूकार से दूसरा किसी  बैंक से | आजके व्यापारिक युग में  भी गाँव देहात के लोग बैंक के बजाय किसी  साहूकार से उधार लेना पसंद करते है | जो उसे हर फसल पर लेना पड़ता है | इसका सीधा सा कारण है बैंक का कम लचीलापन होना . साहूकार का बढ़ता व्याज और किसान पर पड़ता उसका दबाब आखिर में किसान बैंक में जाने को मजबूर हो जाता है और किसान कार्ड के नाम पर अपनी जमीन बैंक में लिखा कर बैंक से लोन लेलेता है | लेकिन साहूकार द्वारा दिया गया पैसा बद्दस्तूर बढता ही रहता है , ऐसे में बेचारा  जमीन बेचने तक को मजबूर हो जाता है | जमीन का बेचना तब तक सम्भव नही हो पाता जब तक बैंक का ऋण पूरा चुकता नही जाता ऐसे में बेचीं हुई जमीन का लिया पैसा ज्यादातर बैंक के लोन को चुकाने में ही चला जाता है | ऐसे में स्थति पहले से भी बदतर हो जाती है ,न तो किसान का कर्ज चुकता और जमीन से हाथ धोना पड़ा वो अलग !!! सरकार को क्या ये हकीकत पता नही है ??? होगी भी कैसे जमीन से जुड़े कितने लोग सरकार में होते है , जो इन भयानक सचाई का बखूबी बयां कर सके ?? शायद अब कोई नही !! इस समस्या का स्थाई समाधान ढूढने की सख्त जरुरत है क्यूँ कि देश की आर्थिक तरक्की में किसान का बहुत बड़ा योगदान पहले भी था और अब भी है | 

मन के झरोके से

नया बित्तीय साल शुरू हो चूका है ,खाते ,वही, कर, सभी काम जो धन से जुड़े है उन्हें सम्भालने का समय है | पर क्या  कभी  सोचा है , क्या पैसा ही सब कुछ है हम अपनी जिन्दगी में कितनी चीजों की  पैसे के साथ तुलना कर सकते है | या फिर यूँ कहे कि, कितनी चीजें बिना पैसे के सम्भव है और कितनी चीजें नही . कभी इस बारे में आत्ममंथन करने का प्रयास किया है ? शायद नही , हम अपनी जिन्दगी या तो अहम में जीते है या वहम में !! अहम इस बात का कि हमारे जैसा कोई नही और वहम इस बात का जो हम कर रहे है ऐसा कोई कर नही सकता !!! कभी मन के झरोके में  झाँकने की कोशिश भी करनी चाहिए , कि क्या कभी मन के खाते से पूरे साल भर कोई लेन देन हुआ है ? मन को टटोलने की जहमत उठाए कोन !!  " मन ही देवता मन ही ईश्वर वाला " तरीका शायद पुराना हो गया अब उस बारे में कोई गौर नही करता | हम जरुरत से ज्यादा एकांकी होते  जा रहे है न अपनी सुन रहे है न किसी और की !!! फिर ऐसे में किया क्या जाये ?  मन के मुताविक नही चला जा सकता तो कम से कम उस इच्छा का ख्याल तो रखा जाये जब किसी भले बुरे कर्म को करने से पहले मन से निकलती है !! काम कोई भी किया जाये लेकिन अपना मन उस समय द्वंद में फस जाता है जब किया हुआ काम मन के मुताविक नही होता | मन हमे न करने को कहता है और दिमाग पर शैतानियत सवार हो जाती है और आखिर में जीत सैतानी दिमाग की होती है और मन बेचारा दुखी होकर रह जाता है !!! ध्यान रहे मन से बड़ा कोई तीर्थ नही कोई देवता नही दया, क्षमा ,कृपा, भलमनसाहत ये ऐसे खाते है इनका साल भर लेन देन चलते रहना चाहिए !!  

महावीर जयन्ती पर बिशेष

मानव को दया और अहिंसा  तथा मन की पवित्रता की शिक्षा देने वाले महावीर का जन्म बिहार के वैशाली राज्य के राजपरिवार में हुआ था किन्तु बचपन से ही राज-कार्य या धन-सम्पत्ति आदि के प्रति उनके मन में कोई आकर्षण नहीं था । सांसारिक जीवन में उनको कोई लगाव नही था परहित का सदा उनका मानस जनता में उनको सबसे अलग रखता था दया, क्षमा ,ममता की प्रतिमूर्ति उनको सभी मानते है | 
जैन धर्म के नाम से चलने वाले स्कूलों में भी जैन मंदिरों के समान ही वातावरण  बन जाता है । पूजा-पाठ तथा तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम  प्रस्तुत किये जाते हैं । स्कूल के विद्यार्थी तथा स्त्री-पुरुष भक्ति-भाव से महावीर स्वामी की जय-जयकार करते हुए कहीं-कहीं जुलूस  भी निकालते हैं । शोभा-यात्राओं में जैन साधु-संत सम्मिलित होते हैं । पूरे देश में इस दिन सार्वजनिक छुट्‌टी  रहती है ।
महावीर जयन्ती केवल एक पर्व या उत्सव ही नहीं बल्कि सत्य, सादगी, अहिंसा और पवित्रता का प्रतीक  है । इस पर्व से हमें हर वर्ष यह प्रेरणा  देने का प्रयत्न किया जाता है कि हमें अपने जीवन में झूठ, कपट, लोभ-लालच और दिखावे से दूर रखना चाहिए तथा सच्चा, शुद्ध और परोपकारी जीवन जीना चाहिए त भी अपना और इस संसार का कल्याण संभव है ।

वर्तमान का यक्ष प्रश्न

वर्तमान में अपने भारत की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का यदि अनुशीलन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि सर्वत्र अराजकता का परिवेश बना हुआ है। कारण है कि ‘राजा’ का चुनाव करने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है, राजा की कोई योग्यता निर्धारित नही की गयी है और देश में राजनीतिक आचार संहिता का कोई प्राविधान नही किया गया है। यदि एक आदर्श राजनीतिक आचार संहिता का पालन करना देश के राजनीतिज्ञों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और यह बता दिया जाए कि राष्ट्रहित के अमुक-अमुक मुद्दों पर भी यदि किसी ने विपरीत सुर निकाले तो उसकी संसद या विधानमंडल की सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी तो देश में आजम खां से लेकर ओवैसी और शाहबुद्दीन से लेकर फारूख अब्दुल्ला तक कितने ही लोगों को जेलों की हवा खानी पड़ जाएगी। लेकिन वर्तमान राजनीति ‘भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर देश विरोधी और समाज विरोधी बयान देने वालों या समाज में अराजकता का वातावरण बनाने वालों की ही सुरक्षा में लगी दिखाई देती है। हमारा कहने का अभिप्राय है कि वर्तमान में समाज में लोगों की संपत्तियों पर अवैध कब्जा करने वाले भूमाफिया, नारी का शील हरण करने वाले व्यभिचारी, समाज में साम्प्रदायिकता का विष घोलकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले राजनीतिज्ञ केवल इसलिए खुले घूमते हैं कि उन पर लगाम लगाने वाली कोई राजनीतिक आचार संहिता देश में नही है।
जिस देश में व्यावहारिक तौर पर ये मान लिया जाता है कि राजनेता के पास सौ दो सौ लट्ठ चलाने वाले नही हो वो क्या राजनेता है !!! एक पुरानी कहाबत है "चार लट्ठ का चौधरी पाच लट्ठ का पञ्च , जिसके पीछे छ लाठी वो अन्च गिने न पञ्च " !!! 

राजनीति के वर्तमान निराशाजनक परिवेश पर थोड़ा चिंतन करने की आवश्यकता है। सवा अरब की जनसंख्या के देश के लिए कुल 543 जनप्रतिनिधि देश की लोकसभा में बैठते हैं। अब इनका आचरण देखिए, और इच्छाशक्ति का परीक्षण करिये। इनमें से जितने विपक्ष के सांसद हैं वे सभी देश चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की मानते हैं और कहते हैं कि-‘चलाओ देश! क्योंकि देश चलाने की जिम्मेदारी जनता ने तुम्हें दी है और हम चलने नही देंगे क्योंकि तुम्हें (वास्तव में देश को) रोकने की जिम्मेदारी देश की जनता ने हमें दी है . इस तरह का गतिरोध क्या देश को आगे ले जाने में सहायक होगा ! गैर राजनैतिक प्रष्ठभूमि के दो राजनैतिक प्रयोग हुए है देश में जिन्हें युवा जोश के तौर पर जाना जाता था एक अस्सी के दशक में असम गन परिषद के प्रफ्फुल मोहंत और वर्तमान में आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल ??? प्रफ्फुल के ज़माने की बात करे तो आज के वनस्पति पहले के दौर में स्वीकार्योक्ति  ज्यादा थी जनादेश का पालन किया जाता था ,भजनलाल जैसे अपवाद अगर छोड़ दिए जाये तो उठा पटक का इतना भयावह दौर वो नही था ! पर आज के दौर में ऐसा कतई नही है दिल्ली में भाजपा की हार  क्या हुयी सरकार चलाना आम आदमी पार्टी को मुश्किल कर दिया . उनके बिधायक भैंस चोरी छेड़छाड़ के मामलो में गिरफ्फ्तार किये गए अंत में लाभ के पद का मामला तो उनके बीस बिधायको को अयोग्य ही घोषित करा दिया .वो तो माननीय न्यायलय ने उनकी सुनी तब जाकर उनकी कुर्सी बची . इस तरह के क्रिया कलापों के क्या मायने निक़ाले  जाये ये सब के सामने है . राष्ट्रपति जैसा गरिमापूर्ण पद भी इस मामले में अपने आपको तट्स्थ नही रख पाया राजनीति का इससे बड़ा हास नही हो सकता ! जरूरत है दोनों सरकारे मिलकर जनता के कल्याण के बारे में सोचे और जनता द्वारा दिए गए जनादेश का पालन करे 

रिश्तों का बदलता स्वरूप


आदमी जब *पत्तल* में खाना खाता था,
मेहमान को देख के वह *हरा* हो जाता था,
स्वागत में पूरा परिवार बिछ जाता था....
बाद में जब वह *मिट्टी के बर्तन* में खाने लगा,
रिश्तों को *जमीन से जुड़कर* निभाने लगा..
फिर जब *पीतल के बर्तन* उपयोग में लेता था,
रिश्तों को *साल छः महीने* में चमका लेता था...
लेकिन बर्तन *कांच* के जब से बरतने लगे,
एक *हल्की सी चोट में रिश्ते बिखरने लगे ...*
अब *बर्तन, थर्मोकोल पेपर के इस्तेमाल होने लगे,*
सारे *सम्बन्ध भी अब यूज़ एंड थ्रो होने लगे ...*
रिश्ते ताजमहल की तरह है साहिब ,दूर से देखने पर बहुत सूंदर लगते है पर इनको खूबसूरत बनाने में कितना वक़्त लगा कोई नही जनता ।जरूरत है हर रिश्ते को शिद्दत से सहेजने की तभी कोई रिश्ता सही रूप ले पाता है ।

आधुनिक जीवन शैली के बदलते ढ़ंग !!!!


एक सेठ के पास में एक गधा और एक कुत्ता ( असली वाला कुत्ता ) था ,सेठ जी जब भी शाम को अपने काम से घर आते ,तो उनका कुत्ता उनके सामने दुम हिलाता लोट्ता कभी दोनों पैर सेठ जी के सीने तक रखता .कभी जूतों को जीभ से चाटता इस मान म्नुब्बल को गधा देखता रहता ! एक दिन गधे ने कुत्ते से पूछा , कुत्ते भाई जब मालिक साहब आते है तो आप रोजाना ऐसा क्यूँ करते हो ??? कुत्ता बोला तुम तो बंधे रहते हो तुम्हे क्या पता , सेठ जी रोजाना मुझे खाने की अलग अलग चीजे लाते है !!! अब आप ही सोचो हमारे ऐसा करने से ही अगर वो खुश हो जाते है तो तुम्हारी तरह बोझा किस लिए ढोना ??? गधे के दिमाग में बात बैठ गयी ......शाम को सेठ जी आये गधा तो दरवाजे के पास ही बंधा रहता था ने दो तीन बार अपना होचिक होचिक ......वाला राग अलापा तो सेठ जी की नजर उस पर गयी !!! गधे ने देखा मौका अच्छा है उसने अपने दोनों पैर सेठ जी के सीने पर और लम्बी जीभ सेठ जी के मुह पर ......... सेठ जी धडाम से जमीन पर !!!!!! . सेठ जी गुस्से से आग बबूला ,बमुश्किल खड़े हुए पास ही रखा एक डंडा उठाया और गधे में देना शुरू . गधे को जमकर पीटा !!! गधा निरपराध सा खड़ा खड़ा आंसू बहा रहा था ! थोड़ी देर में अंदर से कुत्ता आया और गधे की उदासी का कारण पूछा !!!! क्या हुआ गधे भाई बहुत उदास हो ? गधा बोला , क्या बताऊ मेरे भाई हमे तो चमचा गिरी भी नही आती !!!!!! दोस्तों कहानी का सार यही है जो आया जिस काम को उस और न होय .........आप सब आधुनिक कुत्तो से जरुर सावधान रहे !!!!

नोट :-कृपया कोई ब्यक्ति विशेष इसे अपने से जोडकर न देखे ये सिर्फ और सिर्फ कुत्तो के लिए ही है !!!!!

मैं और मेरे तर्क

जिंदगी की जद्दो जहद में ये समय बड़ा तेजी से निकलता है ,इसके भी अपने अपने मायने है । कोई कहता है समय कटता नही और कोई कहता है कि समय मिलता नही । ऐसे में खुद को कहा खड़ा पाते है ये देखने वाली बात है ।
सुख दुःख का अपना दौर है , और इसे सभी अपने अपने तरीके से जीते । आज के  भौतिकवादी युग में सभी एक दूसरे से जीने के तरीके की प्रतिस्पर्धा में ज्यादा लगे हुए है । हमे अपनी जरुरतो के हिसाब से अपने जीने के तरीके अपनाने चाहिए जबकि ऐसा होता नही  । पड़ोसी के घर में फ्रीज ,वाशिंग मशीन, ए सी सभी चीजे हो सकती है और आपके पास उन सब का अभाव है तो इसका असर आपकी व्यवहारिक जिंदगी पर जरूर पड़ेगा । अब इसका पड़ने वाला असर भी हमारी सोच से ही परिलक्षित होता । सोच सकारात्मक है तो आप अपने सबंध पडोसी से मधुर रखेंगे और कभी कभार किसी मौके पर उनके घर से फ्रीज का ठंडा पानी आप ले सकते है । पर यह आपके व्यव्हार पर ही निर्भर करेगा । अगर आप उनके बारे में अपने दिल में नकारात्मक सोच रखते है तो उनके बारें में हमेशा गलत आंकलन करते रहेंगे । हमेशा अपने लिए किसी भी मोके पर उनसे वाद विवाद करने के बहाने तलाशने चाहेंगे । इसका एक उदाहरण ऐसे भीं समझाया जा सकता है । आपने अपनी ऊँगली में सोने की अंगूठी पहनी हुयी है और मेरी ऊँगली कट गयी है । मैं अपनी कटी ऊँगली का दर्द भूल गया ,लेकिन आपकी अंगूठी मेरी जलन का मुख्य कारण है । अगर यही सकारात्मक सोच का अंदाज होता तो मैं खुद यही सोचता कि उसने सोने की अंगूठी अपनी मेहनत से पहनी है और तू तो खुद पहन ही नही सकता क्यूं कि तेरी तो कटी हुयी है । असल में दुःख का कारण यही है । ये दुःख अपनी सोच से ही मिटाया जा सकता है ।
जय श्री राम ।
भगवान राम के जन्मोत्सव का पावन पर्व चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की।नवमी तिथि को मनाया जाता है ।

राम भगवान विष्णु के सबसे पुराने अवतारों में से एक है, जो एक मानव रूप है. भगवान राम का जन्म मध्यान्ह काल में व्याप्त नवमी तिथि को पुष्य नक्षत्र में हुआ था. हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक में श्री राम के रुप में अवतार लिया था. श्रीराम चन्द्र जी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में कौशल्या की कोख से , राजा दशरथ के घर में हुआ था. दुनिया भर में भक्त इस दिन को शुभ दिन मानते हैं. यह दिन वसंत के मौसम में मनाया जाता है.

यह त्यौहार चैत्र के हिंदू कैलेंडर माह के नौवें दिन आता है. चैत्र के महीने के नौवें दिन राम नवमी का उत्सव पृथ्वी पर परमात्मा शक्ति के होने का प्रतीक है। इस दिन भगवान विष्णु का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र राम के रूप में हुआ था। इस दिन भगवान राम के भक्त अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए कुछ विस्तृत रीति-रिवाज करते हैं। राम के जन्म का उद्देश्य रावण की दुष्ट आत्मा को नष्ट करना था। इसलिए राम नवमी का उत्सव धर्म की शक्ति की महिमा , अच्छे और बुरे के बीच शाश्वत संघर्ष को दर्शाता है।

राम नवमी का दिन सूर्य की प्रार्थना करने के साथ शुरू होता है। सूर्य शक्ति का प्रतीक है और हिंदू धर्म के अनुसार सूर्य को राम का पूर्वज माना जाता है इसलिए, उस दिन की शुरुआत में सूर्य को प्रार्थना करने का उद्देश्य सर्वोच्च शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करना होता है।

अयोध्या में राम नवमी उत्सव भगवान राम के जन्मस्थान उल्लेखनीय हैं. जन्म भूमि अयोध्या में यह पर्व बडे हर्षो उल्लास के साथ मनाया जाता है. वहां सरयु नदी में स्नान करके सभी भक्त भगवान श्री राम जी का आशिर्वाद प्राप्त करते हैं.राम नवमी से पहले आठ दिन का उपवास किया जाता है. ऐसा माना गया है कि महाकवि तुलसीदास जी ने राम चरित मानस की रचना इसी दिन प्रारम्भ की थी । दिन के प्रारम्भ में सुबह स्नानादि से निब्रत होकर पहले घरो में कुंजक पूजन किया जाता है और साथ ही भगवान राम का जन्मोत्सव मनाया जाता है ।

शहीदी दिवस ,अमर शहीद ,राजगुरु ,सुखदेव भगत सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि

जय हिन्द दोस्तों ।।
शहीदी दिवस पर अपने अपने तरीके से सबने श्रद्धांजलि दी पर क्या कंभी एकं पल भी सोचा है जो बलिदान उन महान सेनानियों ने भारत माता की खातिर दिया क्या उस बलिदान की सार्थकता कही किसी कोने में बची है ,या हर साल यूँ ही खाना पूर्ति करके अपने हाथ झाड़ लेंगे । क्या बर्तमान परिपेक्ष्य को देखा जाये तो शायद सभी बलिदानियों की आत्मा अपने आपको सोचने पर मजबूर होती होगी क्या यही वो हिंदुस्तान है जहा झूठ दम्भ ,जातिवाद ,क्षेत्रवाद भ्र्ष्टाचार अलगाववाद आतंकवाद माओवाद रोजाना देश की जड़े खोखली करने पर अडिग है , दोस्तों प्रण ले इन बुराइयों से निजात पाने की अपनी अपनी सार्थक कोशिश करे और भारतवर्ष को मजबूत बनाये ।
सरदार भगत सिंह जी द्वारा ज्यादातर गुनगुनाने वाली शायरी के उद्वत अंश :

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।

कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।

मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे, रहे न रहे।

साभार सरदार भगत  सिंह
आपका
निर्भय सिंह
बडेसरा

#महाराजा भरतपुर

रसिये वाली डूंगरी तोकू सात सलाम ।।
उड़ें कसूमर पागड़ी लज्जा राखे राम ।।
#महाराजा भरतपुर

सुप्रभात ,
हिन्दू नववर्ष 2075 एवम् चैत्र नवरात्र स्थापना दिवस पर आपको हार्दिक शुभकामनाये । माँ भवानी से यही प्रार्थना है क़ि आने वाला नव वर्ष आपके जीवन में खुशियां लेकर आये इन्ही मंगल कामनाओ के साथ ।
आपका
निर्भय सिंह 
बडेसरा