मत छिपना सूरज अभी मुझे

 मत छिपना सूरज अभी मुझे बहुत दूर चलना है !!

मैं सोचूँ उनके बारे में

जो बैठे है अंधियारे में ,

कहने भर को है लुंज पुंज 

जो चलते है तनिक सहारे में 

तू उनका साथ निभाने को कुछ कम करदे चलना है !!

मत छिपना सूरज अभी मुझे.......

चन्दा भी देता उजियारा 

शीतल सुंदर मधुरम प्यारा

चमक चांदनी पर मोहित हो जाता है ये जग सारा

तुझे शीतल मंद कहूँ कैसे तूने सीखा जलना है 

नही छिपना सूरज अभी मुझे 

..................................//..कमशः

सादर

निर्भय सिंह बडेसरा 

चुनिंदा शायरी

 एक अनोखा सा लगाव 

समेटे अनेकों ख्वाव 

फूलों सी नाजुक दमकता महताब 

मन हटता ही नही तेरी सौख अदाओ से

मत दूर कर मुझे अपनी पनाहों से


एक अनजान सा डर 

कर गया घर 

उम्र पर सफेदी हावी  है 

मन तो मन है उसकी भी कोई चाबी है 

बहुत दूर है लेकिन मन के बहुत करीब है 

वो मेरा हमदम है मेरा रकीब है


मेरा मन मुझसे अक्सर सवाल करता है 

बहुत जिद्दी है तू कहकर कमाल करता है 

उसे भूलजा थोड़ा भूलकर तो देख 

किसी ओर मंजिल की तरफ तो देख 

मन के सवाल से दिल बहुत नाराज है 

वो मेरा सब कुछ है मेरा नासाज है 

तू अपनी सोच मुझे क्या समझायेगा 

जिस दिन वो मुझे याद करेगा मुझे अपने पहलू में पायेगा 

मेरा उससे रिश्ता रूह से रूह का है 

ओर तू सोचता है सिर्फ जुस्तजू का है



मैं  चाहे सारे दिन परेशां अपने धंधे में रहूं 

पर सुकून ए शाम तेरे कंधे पर रहूं 

मैं जानता हूँ कि ये तमन्ना न पूरी हो पाएगी  

अब तो बची ही कितनी है ये भी गुजर जाएगी 

पर एक वायदा कर कभी  मेरी ही बनकर रहोगी न

रंज गम साथ रहकर सहोगी न 

दिल से दिल का यह एहतराम रहेगा 

ये प्यासा दिल हमेशा तेरे नाम रहेगा