मत छिपना सूरज अभी मुझे बहुत दूर चलना है !!
मैं सोचूँ उनके बारे में
जो बैठे है अंधियारे में ,
कहने भर को है लुंज पुंज
जो चलते है तनिक सहारे में
तू उनका साथ निभाने को कुछ कम करदे चलना है !!
मत छिपना सूरज अभी मुझे.......
चन्दा भी देता उजियारा
शीतल सुंदर मधुरम प्यारा
चमक चांदनी पर मोहित हो जाता है ये जग सारा
तुझे शीतल मंद कहूँ कैसे तूने सीखा जलना है
नही छिपना सूरज अभी मुझे
..................................//..कमशः
सादर
निर्भय सिंह बडेसरा