सूखे में बाढ़ में फसलें थी धान की |
फिर भी अमीन लाये नोटिस लगान की ||
पत्रे में लग्न खूब थे पंडित भी कम न थे ,
फिर भी कुंवारी रह गयी बेटी किसान की ||
आज की तत्कालिक परिस्थिति किसान के बारे में उपरोक्त पंक्तियाँ बखूबी बयां करती है , फोरी तौर पर किसान को कही से कोई राहत मिलती नजर नही आ रही | उपर से बेमोसमी बारिस ने और उसकी दुबिधा और बढा दी है | सरकार पर कागजी आंकड़े इतने सारे है कि दिखाने को देश बिकसित और किसान बिकासशील नजर आता है , जबकि हकीकत इससे कोसो दूर है | किसान को सहूलियत के नाम पर सरकार के पास कोई अल्लादीन का चिराग नही है जो कहा और हो गया | सरकार योजना बनाएगी फिर उनका क्रियान्वयन होगा ? ऐसा होने में न जाने कितने साल बीत जायेंगे | जरुरत है स्थाई समाधान की , जो होता नजर नही आता | किसान की जीविका कृषि पर और वो जमीन पर ही संभव है ,आज तक ऐसी कोई तकनीक नही आयी कि किसी प्रकार की खेती बिना जमीन के संभव हो सके | जमीनी गणित भी किसान के हक में नही है ... ज्यादा लागत भरी फसल और उसका कम उत्पादन ऐसे में अपना घाटा कैसे संतुलित किया जाये ?ऐसे में किसान को फसली ऋण लेने को ही मजबूर होना पड़ता है | ऋण लेने के दो ही रास्ते है ...पहला किसी जानकारी वाले साहूकार से दूसरा किसी बैंक से | आजके व्यापारिक युग में भी गाँव देहात के लोग बैंक के बजाय किसी साहूकार से उधार लेना पसंद करते है | जो उसे हर फसल पर लेना पड़ता है | इसका सीधा सा कारण है बैंक का कम लचीलापन होना . साहूकार का बढ़ता व्याज और किसान पर पड़ता उसका दबाब आखिर में किसान बैंक में जाने को मजबूर हो जाता है और किसान कार्ड के नाम पर अपनी जमीन बैंक में लिखा कर बैंक से लोन लेलेता है | लेकिन साहूकार द्वारा दिया गया पैसा बद्दस्तूर बढता ही रहता है , ऐसे में बेचारा जमीन बेचने तक को मजबूर हो जाता है | जमीन का बेचना तब तक सम्भव नही हो पाता जब तक बैंक का ऋण पूरा चुकता नही जाता ऐसे में बेचीं हुई जमीन का लिया पैसा ज्यादातर बैंक के लोन को चुकाने में ही चला जाता है | ऐसे में स्थति पहले से भी बदतर हो जाती है ,न तो किसान का कर्ज चुकता और जमीन से हाथ धोना पड़ा वो अलग !!! सरकार को क्या ये हकीकत पता नही है ??? होगी भी कैसे जमीन से जुड़े कितने लोग सरकार में होते है , जो इन भयानक सचाई का बखूबी बयां कर सके ?? शायद अब कोई नही !! इस समस्या का स्थाई समाधान ढूढने की सख्त जरुरत है क्यूँ कि देश की आर्थिक तरक्की में किसान का बहुत बड़ा योगदान पहले भी था और अब भी है |
फिर भी अमीन लाये नोटिस लगान की ||
पत्रे में लग्न खूब थे पंडित भी कम न थे ,
फिर भी कुंवारी रह गयी बेटी किसान की ||
आज की तत्कालिक परिस्थिति किसान के बारे में उपरोक्त पंक्तियाँ बखूबी बयां करती है , फोरी तौर पर किसान को कही से कोई राहत मिलती नजर नही आ रही | उपर से बेमोसमी बारिस ने और उसकी दुबिधा और बढा दी है | सरकार पर कागजी आंकड़े इतने सारे है कि दिखाने को देश बिकसित और किसान बिकासशील नजर आता है , जबकि हकीकत इससे कोसो दूर है | किसान को सहूलियत के नाम पर सरकार के पास कोई अल्लादीन का चिराग नही है जो कहा और हो गया | सरकार योजना बनाएगी फिर उनका क्रियान्वयन होगा ? ऐसा होने में न जाने कितने साल बीत जायेंगे | जरुरत है स्थाई समाधान की , जो होता नजर नही आता | किसान की जीविका कृषि पर और वो जमीन पर ही संभव है ,आज तक ऐसी कोई तकनीक नही आयी कि किसी प्रकार की खेती बिना जमीन के संभव हो सके | जमीनी गणित भी किसान के हक में नही है ... ज्यादा लागत भरी फसल और उसका कम उत्पादन ऐसे में अपना घाटा कैसे संतुलित किया जाये ?ऐसे में किसान को फसली ऋण लेने को ही मजबूर होना पड़ता है | ऋण लेने के दो ही रास्ते है ...पहला किसी जानकारी वाले साहूकार से दूसरा किसी बैंक से | आजके व्यापारिक युग में भी गाँव देहात के लोग बैंक के बजाय किसी साहूकार से उधार लेना पसंद करते है | जो उसे हर फसल पर लेना पड़ता है | इसका सीधा सा कारण है बैंक का कम लचीलापन होना . साहूकार का बढ़ता व्याज और किसान पर पड़ता उसका दबाब आखिर में किसान बैंक में जाने को मजबूर हो जाता है और किसान कार्ड के नाम पर अपनी जमीन बैंक में लिखा कर बैंक से लोन लेलेता है | लेकिन साहूकार द्वारा दिया गया पैसा बद्दस्तूर बढता ही रहता है , ऐसे में बेचारा जमीन बेचने तक को मजबूर हो जाता है | जमीन का बेचना तब तक सम्भव नही हो पाता जब तक बैंक का ऋण पूरा चुकता नही जाता ऐसे में बेचीं हुई जमीन का लिया पैसा ज्यादातर बैंक के लोन को चुकाने में ही चला जाता है | ऐसे में स्थति पहले से भी बदतर हो जाती है ,न तो किसान का कर्ज चुकता और जमीन से हाथ धोना पड़ा वो अलग !!! सरकार को क्या ये हकीकत पता नही है ??? होगी भी कैसे जमीन से जुड़े कितने लोग सरकार में होते है , जो इन भयानक सचाई का बखूबी बयां कर सके ?? शायद अब कोई नही !! इस समस्या का स्थाई समाधान ढूढने की सख्त जरुरत है क्यूँ कि देश की आर्थिक तरक्की में किसान का बहुत बड़ा योगदान पहले भी था और अब भी है |