मन के झरोके से

नया बित्तीय साल शुरू हो चूका है ,खाते ,वही, कर, सभी काम जो धन से जुड़े है उन्हें सम्भालने का समय है | पर क्या  कभी  सोचा है , क्या पैसा ही सब कुछ है हम अपनी जिन्दगी में कितनी चीजों की  पैसे के साथ तुलना कर सकते है | या फिर यूँ कहे कि, कितनी चीजें बिना पैसे के सम्भव है और कितनी चीजें नही . कभी इस बारे में आत्ममंथन करने का प्रयास किया है ? शायद नही , हम अपनी जिन्दगी या तो अहम में जीते है या वहम में !! अहम इस बात का कि हमारे जैसा कोई नही और वहम इस बात का जो हम कर रहे है ऐसा कोई कर नही सकता !!! कभी मन के झरोके में  झाँकने की कोशिश भी करनी चाहिए , कि क्या कभी मन के खाते से पूरे साल भर कोई लेन देन हुआ है ? मन को टटोलने की जहमत उठाए कोन !!  " मन ही देवता मन ही ईश्वर वाला " तरीका शायद पुराना हो गया अब उस बारे में कोई गौर नही करता | हम जरुरत से ज्यादा एकांकी होते  जा रहे है न अपनी सुन रहे है न किसी और की !!! फिर ऐसे में किया क्या जाये ?  मन के मुताविक नही चला जा सकता तो कम से कम उस इच्छा का ख्याल तो रखा जाये जब किसी भले बुरे कर्म को करने से पहले मन से निकलती है !! काम कोई भी किया जाये लेकिन अपना मन उस समय द्वंद में फस जाता है जब किया हुआ काम मन के मुताविक नही होता | मन हमे न करने को कहता है और दिमाग पर शैतानियत सवार हो जाती है और आखिर में जीत सैतानी दिमाग की होती है और मन बेचारा दुखी होकर रह जाता है !!! ध्यान रहे मन से बड़ा कोई तीर्थ नही कोई देवता नही दया, क्षमा ,कृपा, भलमनसाहत ये ऐसे खाते है इनका साल भर लेन देन चलते रहना चाहिए !!