बदलता राजनैतिक परिद्रश्य

सामाजिक न्याय और रामराज्य की परिकल्पना के निहितार्थ सरकारे लोकलुभावन योजनाओ की रुपरेखा बनाती तो है , लेकिन असल में उनके क्रियान्वयन  के उपर जोर होता नही | निर्वाचन से पूर्व सरकारे ऐसे वायदे भी कर जाती है जिनका वास्तविकता से कोई सरोकार नही होता | चुनाव विशेषज्ञ लोकलुभावन नारों को ऐसे गढते है जैसे सब कुछ अभी बदलने वाला है ?? चुनाव पूर्व और बाद  के समीकरणों को एक रूप में नही तोला जा सकता | अपनी अपनी सोच और परिकल्पना के आधार पर राजनेतिक पार्टिया लोगो के बीच जाती है !!! काफी दशक पूर्व जब सायकिल या पैदल चलकर लोग अपना प्रचार करते थे ,कुछ नये नारे सुनने को  मिलते थे जिनमे पार्टी विशेष की बुराई छिपी होती थी ,व्यक्तिगत आक्षेप नही होता था "बीडी में तम्बाकू है ...कांग्रेस वाला डाकू है ?? कालांतर में फिर माहोल बदलने लगा और आरोप जातिगत हो गए ,तिलक तराजू और तलवार ....इनको मारो जुते चार !!!! अब दोनों नारों को देखा जाये तो अपनी अपनी पार्टी को फायदा पुहुचाने को लेकर इनको गढ़ा गया  पर दोनों के द्वारा दिया गया संदेश अलग अलग है | फिर धार्मिक कट्टरता का समावेश होने लगा "गर भारत में रहना होगा ...वन्देमातरम कहना होगा , ||| सौगंध राम की खाते है ..हम मंदिर वही बनायेंगे  | नारों का चुनावो से तो सीधा सम्बन्ध है पर इसका व्यवहारिक रूप से किसी पर कितना असर पड़ेगा ये कहना बहुत मुश्किल है | धीरे धीरे करके कालखंड के आधार पर चुनावी बिसात कुछ अलग अलग करके बिछनी सुरु हो गयी | सत्ता के प्रति लोगो का झुकाव, गिरती साख ,और ओछी मानसिकता ने सारी दिशा ही बदल दी है | आज के ज़माने में यथार्त कम और बनावटी पन ज्यादा है | जनता सजग है पर उसे ठेगा दिखने वाले पहले से ज्यादा शातिर है | हर तरफ से जनता को  ठगने में लग हुए है ?? तभी तो बढती तकनीक और जागरूकता के वावजूद राजनैतिक दलों के झूठ पर लगाम  लगाना मुश्किल हो रहा है . जब उनसे इस बारे में पूछा भी जाता है तो अपने द्वारा किया हुआ वायदा महज एक जुमला प्रतीत होता है और इसी का बहाना करके वो अपना पीछा जनता से छुड़ा लेते है |