मनुष्य एक सामजिक प्राणी है और जीवन जीने की कला उसे बखूबी आती है | अपनी सहूलियत के हिसाब से मनुष्य अपने आप में कई तरह से परिवर्तन स्वयं कर लेता है ! हाल ही के  दिनों में देश में राजनैतिक उठा पटक देखने को मिली , राष्ट्रिय स्तर के दोनों दलों ने अपना अपना वजूद कायम रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया |आप भी अंदाजा लगा रहे होंगे कि बात कहा की चल रही है , जी हा आपका कयास बिलकुल निशाने पर है !!! किस्सा कर्नाटक का है , भाजपा को अति महत्वाकांक्षा ले डूबी | भाजपा के सिपहसलार रेड्डी बंधुओ की तिकडम काम नही आई !! येदुरप्पा से भी जिस तरह के करिश्मे की उम्मीद थी ऐसा वो कर नही पाए ,बाकि लोग जैसे अनंत कुमार ,करन्द्ज्लाने आदि कोई खास उपयोगी हुआ नही !! उधर कांग्रेस के पास राज्य खोने के अलावा कोई चारा नही था !!सिद्धारमैया अपने लिंगायत वाले फार्मूले में खुद ही फस गए थे ,उनके भाजपा समकक्षो ने लिंगायतो को टिकट देकर उनको तक़रीबन फेल कर दिया था !!! लेकिन इसके बाद भी उनका प्रदर्शन ऐसा नही था कि पार्टी उन्हें डाट फटकार लगाये या उनके काम को लेकर नाखुशी जाहिर करे !! इसका एक सीधा सा कारण यही था कि भाजपा की देशव्यापी लहर और व्रहत प्रचार तंत्र के होने के बाद भी वो भाजपा को सत्ता की दहलीज पर जाने से रोकने में कुछ हद तक सफल रहे है !!
सत्ता में आंकड़ो का बड़ा महत्व होता है  78 सीटे जीत कर वो अपने वजूद को कुछ हद तक दोड़ में शामिल रहने में कामयाब रहे  ,अगर इतनी सीटें कांग्रेस नही जीतती तो भाजपा निश्चित सरकार बना देती ,कुमारस्वामी प्लान धरा का धरा रह जाता ,हालंकि सिद्धारमैया अपने आपको अंतिम दिन तक कांग्रेस को सत्ता के करीब देख रहे थे ,चुनाव परिणाम जैसे ही आना शुरू हुआ राजनैतिक दलों में हलचल मचना लाजिमी था ,लेकिन "दूध का जला छाछ को फूंक फूंक कर पिता है "  इस पर कांग्रेस ने अपने दो धुरंधरों ,अशोक गहलोत और गुलाम नबी आजाद को तुरंत बंगलुरु भेज दिया ,और उन्होंने तमाम तरह की अटकलों को ठेंगा दिखाते हुए कांग्रेस समर्थित सरकार बनाने में अपना पूरा पूरा योगदान दिया !!! इस सबके बीच भाजपा में कुछ विरोधी स्वर भी उठे ,हाशिये पर जा चुके यशवंत सिन्हा, धवन , और भी गुपचुप तरीके से अपनी पार्टी के कर्नाटक में अपनाये जा रहे तरीके से नाखुश दिखे ...मामला सुप्रीम कौर्ट गया और भाजपा जो जोड़ तोड़ पर आमादा थी अपने आप को पंगु समझने लगी !!! और फिर एक अप्रत्यासित चमत्कार की आस में सदन में बहुमत साबित करने पर अडी रही और अंत में हार का अंदेशा होने पर येदुरप्पा ने अपना स्तीफा दे दिया ,अमित शाह ,नरेन्द्र मोदी और नौ साल तक नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल  के समय मंत्रिमंडल में रहने बजुभई वाला भी चाह कर भी कुछ नही कर सके | इतनी हार का अंदेशा किसी को भी नही था ,लेकिन हुयी , अब आगे तीन बड़े राज्यों में चुनाव आने वाले है ,कर्नाटक के नाटक के बाद बिपक्ष अपनी अपनी अलग अलग ही सही लेकिन एक साथ चुनाव रूपी  एपिसोड में भूमिका निभाएगा जरुर ,ऐसे में भाजपा का चिंतित होना निश्चित है कांग्रेस के पास खोने को कुछ भी नही लेकिन भाजपा को होने वाले नुक्सान का आंकलन वो कर चुकी है ,ऐसे में अमित शाह और प्रधान मंत्री दोनों हो मिलकर इस परेशानी से पार नही पा सकते , उनके द्वारा दरकिनार किये गए अपने पुराने दिग्गजों को भी साथ में लेना पड़ेगा और तभी चुनाव रूपी समर में वो कुछ कर सकने की स्थिति में होगी वरना तीनो राज्यों में ज्यादा नही तो हालात कर्नाटक जैसे होंगे ,भाजपा सत्ता तक पुहुच कर भी नही पुहुचेगी !!!