तहजीब और तमीज का मतलब क्या है ,ये कहा से आती है ? तालीम का मकसद क्या है ??तालीम या शिक्षा का मूल मकसद मनुष्य के परिपेक्ष में देखा जाये तो चरित्र की एक ईमारत खड़ी करना समझिये !! सामजिक परिवेश में इसे पारवारिक संस्कार से जोडकर देखते है !! यक्ष प्रश्न यह उठता है ? क्या शिक्षित इन्सान चारित्रिक रूप से उतना ही अच्छा होगा जितना किउसे होना चाहिए ??
लेकिन आज के इस पाश्चात प्रभाव वाले दौर में संस्कार दम तोड़ते नजर आ रहे है |ऐसा हुआ क्यों ? इसकी जड कहा है उन्हें तलाश करने की जहमत उठाए कोन !!
moderanisation and westeranisation are not identical concept !!!
हम आधुनिक हो और होने भी चाहिए ,लेकिन पश्चात् प्रभाव को लाद कर अपने मन में मग्न हम ये न सोचे कि समाज में कोई हमारा भी इसी प्रकार का अनुसरण करे !!
द्वतीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में करीब चार से पांच लाख लोग मारे गए थे उनमे ज्यादातर अनेक देशो सैनिको के साथ साथ सामान्य नागरिक भी शामिल थे | जीवित इंसानों में ज्यादा संख्या महिला वर्ग की थी | युद्ध के उपरांत पैदा हुए तत्कालीन हालातो पर सरकारों काम करना शुरू किया , और गाड़ी धीरे धीरे पटरी पर आने लगी | और यूरोप में आर्थिक सम्रद्धि स्थापित होने लगी , आर्थिक सम्रद्धि के अलावा भी बहुत कुछ करना जरुरी था जिससे सामजिक बिषमताए मिटाई जा सके !!!
सामाजिक विषमताए क्या थी ? पहली सबसे बड़ी समस्या थी पुरुष और महिलाओ की संख्या का असमान होना !!! संख्या में महिला ज्यादा थी और पुरुष कम !! इस असमानता ने वहां के सामाजिक ताने बाने को हिला कर रख दिया !! जिन महिलाओ के पति या होने वाले साथी युद्ध में मारे गयें वो जाये तो जाये कहा ?
इस बात को यूरोपियन देशो की सरकारे ज्यादा दिनों तक नजरंदाज नही कर सकी और युद्ध प्रभाबित देशो ने अपने कानूनों में इस तरह की शिथिलता की कि कोई भी महिला अपने मनोरंजन के लिए किसी पुरुष मित्र से सार्वजानिक स्थानों पर मिल सकती है या सीधे शब्दों में कहे तो अपनी शारीरिक भूख शांत कर सकती है !!!
इस तरह इन क्रिया कलापों को होते वहा की युवा पीडी ने देखा और यह एक रिवाज में बदल गया !!
देश स्वतंत्र होने पर हमारे देश के धनाड्य वर्ग का यूरोपियन देशो में आना जाना शुरू हुआ और वहा से कुछ सीखा या न सीखा पर ये बेहूदापन जरुर सीखा !!! कम कपड़े पहनना, सार्वजनिक स्थानों पर आलिंगन करना, बगैरह बगैरह | बाकी का काम हमारे फिल्म उद्योग ने कर दिया और आज के दौर में मोबाइल ने इसमें अपने चार चाँद लगा दिए !!
इसका असर समाज पर इतना पडा कि कोई अंदाजा नही लगा सकता ,कुछ चरित्र से गिरे लोग कब अपने घर की बहु के दीवाने हो जाते हैं पता नही चलता ?? पता तब चलता है जब बेटा असलियत को भांप कर बाप का सर फोड़ देता है !!! ऐसे चरित्र से गिरे इंसान की नजर कब किस बहु बेटी पर पड जाये और कब उसे अपनी हबस का शिकार बना ले कोई नही जनता !! सरकार बेटी बचाओ बेटी पढाओ का नारा दे रही है पर इन बह्शियो से कोई बेटी सुरक्षित नही !! जरुरत है आप अपने बच्चो को समय दो उन्हें उंच नीच वाली हरकतों का ज्ञान कराओ और अपने बच्चे को भरोसा दिलाओ कि हम आपके साथ है तब जाकर हमारे बच्चे इन तथाकथित पढ़े लिखे बह्शियो से सलामत रहेंगे !!!
उम्मीद है आप सब अपने बच्चो के साथ साथी बनकर उनका ख्याल रखेंगे !!
आप से इसी उम्मीद के साथ
आपका
निर्भय सिंह
बडेसरा