पिछले दो तीन दिन में एक साथ ही पाकिस्तान के अलग अलग तरह के घटनाक्रम हुये है ।
पहला हमारे सैनिक के साथ पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम द्वारा की गई बर्बरता ।।
दूसरा जिनको सिर्फ अपनी मस्ती से मतलब ऐसे लोगो के लिए क्रिकेट के मैदान में पाकिस्तान पर भारत की बड़ी जीत ।।
तीसरा पाकिस्तान के कठपुतली प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा हमारे देश के तथाकथित 56" सीन वाले मजबूत प्रधानमंत्री को भेजा गया विदेश मंत्री स्तरीय बातचीत का न्योता ।।
इन सब बातों से क्या सीख मिली , न पाकिस्तान की बर्बरता बन्द हुई न हम इतने संजीदा हुए कि अपनी सेना के जवान की सहादत के लिए कुछ प्रयत्न करते और ऊपर से हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार बातचीत के लिए राजी ?? सवाल यह उठता है आखिर सरकार चला कोन रहा है ? विदेशनीति के नए परिभाषित आयाम कोन लिख रहा है । हम इतने लचर हो कैसे गए , सेना के हाथ अगर खुले है तो ऐसी कोनसी मजबूरी हो गई कि समाचार पत्रों की सुर्खियों में सेना की मजबूरी सी दिखाई पड़ती है । हमारे जवान 5 किलो की भारी भरकम नकारा INSAS को उठाने को मजबूर क्यों है , हम अभी तक उच्च कोटि हथियार अपने सैनिकों को उपलब्ध क्यों नही करा पाए ।इन प्रश्नों का उत्तर कोई नही दे रहा , लोग क्रिकेट मैच की जीत की ख़ुशी में किसी देशभक्त शहीद के परिवार का रुदन दब जाता है और ऊपर से सरकार पाकिस्तान से बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर शहीदों के जख्मो पर नमक छिड़कने का काम करती है ।मन व्यथित है पुकार रहा है " हे कृष्ण फिर से आओ और अपने सुदर्शन चक्र का प्रताप हमे दिखलाओ ।
इसी उम्मीद में हम सब !!!
पहला हमारे सैनिक के साथ पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम द्वारा की गई बर्बरता ।।
दूसरा जिनको सिर्फ अपनी मस्ती से मतलब ऐसे लोगो के लिए क्रिकेट के मैदान में पाकिस्तान पर भारत की बड़ी जीत ।।
तीसरा पाकिस्तान के कठपुतली प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा हमारे देश के तथाकथित 56" सीन वाले मजबूत प्रधानमंत्री को भेजा गया विदेश मंत्री स्तरीय बातचीत का न्योता ।।
इन सब बातों से क्या सीख मिली , न पाकिस्तान की बर्बरता बन्द हुई न हम इतने संजीदा हुए कि अपनी सेना के जवान की सहादत के लिए कुछ प्रयत्न करते और ऊपर से हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार बातचीत के लिए राजी ?? सवाल यह उठता है आखिर सरकार चला कोन रहा है ? विदेशनीति के नए परिभाषित आयाम कोन लिख रहा है । हम इतने लचर हो कैसे गए , सेना के हाथ अगर खुले है तो ऐसी कोनसी मजबूरी हो गई कि समाचार पत्रों की सुर्खियों में सेना की मजबूरी सी दिखाई पड़ती है । हमारे जवान 5 किलो की भारी भरकम नकारा INSAS को उठाने को मजबूर क्यों है , हम अभी तक उच्च कोटि हथियार अपने सैनिकों को उपलब्ध क्यों नही करा पाए ।इन प्रश्नों का उत्तर कोई नही दे रहा , लोग क्रिकेट मैच की जीत की ख़ुशी में किसी देशभक्त शहीद के परिवार का रुदन दब जाता है और ऊपर से सरकार पाकिस्तान से बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर शहीदों के जख्मो पर नमक छिड़कने का काम करती है ।मन व्यथित है पुकार रहा है " हे कृष्ण फिर से आओ और अपने सुदर्शन चक्र का प्रताप हमे दिखलाओ ।
इसी उम्मीद में हम सब !!!