राम राम सा
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
दुष्यंत कुमार द्वारा लिखित ये पंक्तियां उद्वरित करने का क्या कारण हो सकता है ,लेकिन कौम के नाम पर जगह जगह दुकान खोलकर बैठे ठेकेदारों को जगाने के लिए एक प्रयास भर है ,समाज शिरोमणि समूचे विश्व मे अपनी अमिट पहचान रखने वाले मुग़लों को नेस्तनाबूद करने वाले दिल्ली की सल्तनत को झुकाने वाले महाराजा सूरजमल जी के तेज पर कुछ दुष्ट समझ के लोग उंगली उठा रहे हैं ,सोनी टीवी पर प्रसारित धारावाहिक पुण्यश्लोक अहिल्याबाई में महाराजा सूरजमल जी के किरदार को कमतर आंकने की गन्दी सोच जो धारावाहिक के निर्माता निलेश निनाद वैद्य और प्रसन्नकुमार नितिन वैद्य द्वारा अपनाई गई है उस पर लोगो की चुप्पी बहुत दुखदाई है ,जिंदा कौम वक़्त का इंतजार नही करती और न ही जंग से किसी को बुलावा आता है !! जिसका जमीर मर गया वो न अपने लिए जिंदा है और न अपनी कौम के लिए !! हाल ही में सावरकर के समर्थन में बड़े पुतले फूंके गए थे लेकिन आज उन्हें दर्द नही हो रहा ?? कुछ दिन पूर्व केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भरतपुर वालों को बिन पैंदी का लोटा कहता रहा किसी को दर्द नही हुआ ....क्या सचमुच हम लोग मर गए हैं ?
कुछ तो अपना जमीर रक्खो संभाल के मरने से पहले मरना अच्छा नही होता !! बड़ी बड़ी हांकने वाले अब चुप क्यों हैं किसी को भी थोड़ा सा लिहाज अपनी पहचान को बचाने का नही आ रहा .....क्या लड़ाई लड़ेंगे हम लोग जब किसी की बातें ही नही चुभी तो बाकी की बातें तो बेमानी है ..सोइये खूब जब सब कुछ खत्म हो जाये तो कहना कि हमे तो कुछ मालूम ही नही था ....सांप निकल जायेगा लकीर को पीटते रहना ...... जो अपना इतिहास सलामत नही रख पाते दुनियां उन्हें भुला देती है ....उम्मीद है कुछ तो जगेंगे अपनी पहचान को बचाने को इसी उम्मीद में ......
आपका
निर्भय सिंह बडेसरा