वर्तमान का यक्ष प्रश्न

वर्तमान में अपने भारत की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का यदि अनुशीलन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि सर्वत्र अराजकता का परिवेश बना हुआ है। कारण है कि ‘राजा’ का चुनाव करने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है, राजा की कोई योग्यता निर्धारित नही की गयी है और देश में राजनीतिक आचार संहिता का कोई प्राविधान नही किया गया है। यदि एक आदर्श राजनीतिक आचार संहिता का पालन करना देश के राजनीतिज्ञों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और यह बता दिया जाए कि राष्ट्रहित के अमुक-अमुक मुद्दों पर भी यदि किसी ने विपरीत सुर निकाले तो उसकी संसद या विधानमंडल की सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी तो देश में आजम खां से लेकर ओवैसी और शाहबुद्दीन से लेकर फारूख अब्दुल्ला तक कितने ही लोगों को जेलों की हवा खानी पड़ जाएगी। लेकिन वर्तमान राजनीति ‘भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर देश विरोधी और समाज विरोधी बयान देने वालों या समाज में अराजकता का वातावरण बनाने वालों की ही सुरक्षा में लगी दिखाई देती है। हमारा कहने का अभिप्राय है कि वर्तमान में समाज में लोगों की संपत्तियों पर अवैध कब्जा करने वाले भूमाफिया, नारी का शील हरण करने वाले व्यभिचारी, समाज में साम्प्रदायिकता का विष घोलकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले राजनीतिज्ञ केवल इसलिए खुले घूमते हैं कि उन पर लगाम लगाने वाली कोई राजनीतिक आचार संहिता देश में नही है।
जिस देश में व्यावहारिक तौर पर ये मान लिया जाता है कि राजनेता के पास सौ दो सौ लट्ठ चलाने वाले नही हो वो क्या राजनेता है !!! एक पुरानी कहाबत है "चार लट्ठ का चौधरी पाच लट्ठ का पञ्च , जिसके पीछे छ लाठी वो अन्च गिने न पञ्च " !!! 

राजनीति के वर्तमान निराशाजनक परिवेश पर थोड़ा चिंतन करने की आवश्यकता है। सवा अरब की जनसंख्या के देश के लिए कुल 543 जनप्रतिनिधि देश की लोकसभा में बैठते हैं। अब इनका आचरण देखिए, और इच्छाशक्ति का परीक्षण करिये। इनमें से जितने विपक्ष के सांसद हैं वे सभी देश चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की मानते हैं और कहते हैं कि-‘चलाओ देश! क्योंकि देश चलाने की जिम्मेदारी जनता ने तुम्हें दी है और हम चलने नही देंगे क्योंकि तुम्हें (वास्तव में देश को) रोकने की जिम्मेदारी देश की जनता ने हमें दी है . इस तरह का गतिरोध क्या देश को आगे ले जाने में सहायक होगा ! गैर राजनैतिक प्रष्ठभूमि के दो राजनैतिक प्रयोग हुए है देश में जिन्हें युवा जोश के तौर पर जाना जाता था एक अस्सी के दशक में असम गन परिषद के प्रफ्फुल मोहंत और वर्तमान में आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल ??? प्रफ्फुल के ज़माने की बात करे तो आज के वनस्पति पहले के दौर में स्वीकार्योक्ति  ज्यादा थी जनादेश का पालन किया जाता था ,भजनलाल जैसे अपवाद अगर छोड़ दिए जाये तो उठा पटक का इतना भयावह दौर वो नही था ! पर आज के दौर में ऐसा कतई नही है दिल्ली में भाजपा की हार  क्या हुयी सरकार चलाना आम आदमी पार्टी को मुश्किल कर दिया . उनके बिधायक भैंस चोरी छेड़छाड़ के मामलो में गिरफ्फ्तार किये गए अंत में लाभ के पद का मामला तो उनके बीस बिधायको को अयोग्य ही घोषित करा दिया .वो तो माननीय न्यायलय ने उनकी सुनी तब जाकर उनकी कुर्सी बची . इस तरह के क्रिया कलापों के क्या मायने निक़ाले  जाये ये सब के सामने है . राष्ट्रपति जैसा गरिमापूर्ण पद भी इस मामले में अपने आपको तट्स्थ नही रख पाया राजनीति का इससे बड़ा हास नही हो सकता ! जरूरत है दोनों सरकारे मिलकर जनता के कल्याण के बारे में सोचे और जनता द्वारा दिए गए जनादेश का पालन करे